शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

767-"दो टूक"

"दो टूक"

 

१-तुम करने लगी अचानक
मुझसे नफरत
तबसे
समझ न पाया मैं
अपने जीवन का मतलब

२-अपना हो जाता हैं पराया
पराया हो जाता हैं अपना
जब वह करता हैं
कलाकार की
कला की सराहना

३-करते रहे तुम्हारी ही इबादत
पर तुमने समझा
इसे मेरी आदत

४-एक किताब हूँ मैं
जिसके जिल्द पर धूल जम गयी हैं
एक आईना हूँ मैं
जिसकी हज़ारों आँखें हैं
पर ओंठ सिले हुए हैं

५-कम्प्यूटर के भीतर हैं फेसबुक
जिससे मिलती हैं खुशियां और कभी दुःख

६-मेरी दोस्त हैं डायरी
जिसमे लिखता हूँ मैं
अपनी शायरी

७-जबसे देखा हूँ
तुम्हारी निगाहों में अपनी छवि
तबसे रख आया हूँ
आईने को और कहीं

८-रह जाता
तुम्हारे पास
यदि जीवन में
मिलता अवकाश

९-जीते जी
सीख लिया हूँ मरना
अब मौत से
भला क्या डरना

१०-सभी से कोई
कैसे करे प्यार
दोस्त तो एक ही होता हैं
उसी से क्यों न करे हमें
अपने इश्क़ का इजहार

११-तुम चाहती हो
मुझमे न हो कोई विकार
ऐसा कैसे हो सकता हैं
आखिर मैं भी तो हूँ
एक इंसान
इस बात को करो स्वीकार

१२-तुम हो नदी
मैं हूँ किनारा
मिलता हैं दोनों को
एक दूसरे का सहारा

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

kuchh tasvire





                                        chintu aur ajay .mera daamaad





                                                           mera bada beta -manish






                                              mere chhote bete -manoj ki sagaaii ka chitr 2 -2 14





                                                  chuntu ganv me



                                         
                                             baye se  my wife barakha ,my daughter -madhuri , aur meri saasu maa

766-"मधुमास "

"मधुमास "



वन में
खिल गए पलाश
आ गया मधुमास

सरस हुए बादल
प्यार की बूंदों की
हुई बरसात

उड़ा कर गोरी का आँचल
रसिक हुई बयार

छेड़ गयी अमराई में
कोयलिया मधुर तान

गुनगुनाने लगे भंवरें
उपवन में
कलियों ने किया श्रृंगार

बज उठे नगाड़े
टहनियों पर
झूम उठे पात पात

सुबह लाल सांझ को
सिंदूरी हुआ आकाश

मन की धीरे धीरे
खुलने लगी हैं गाँठ

आने लगे हैं अधरों पर
भूले बिसरे फाग

काट दिया हैं मुझे भी
किसी के प्रखर चितवन ने
पतंग सा उड़ चला हूँ
मैं भी उसके पास

गोपियों संग फिर
रचाएंगे कान्हा रास

वन में
खिल गए पलाश
आ गया मधुमास

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

765-"दो टूक"

"दो टूक"

 

१-
जबसे तुम हुए हो
मुझसे जुदा
तलाश रहा हूँ मैं
तबसे खुदा

२-
कभी मत भेजना मुझे ख़त
न कोई सन्देश
न करना मुझ पर संदेह
मैं खुद आकर मिल लिया करूंगा
हमेशा के लिए अलग होते समय
यह सांत्वना अच्छी हैं

३-
कितनी भी तुम रहो दूर
मुझ तक पहुँच ही जाता हैं
तुम्हारी आँखों का नूर
तुम्हारे ओंठों का रंग
सुबह की लालिमा बन
लिया करता हैं मुझे चूम
खामोशी की रेत पर
बने तुम्हारे पदचिन्हों पर
ठहरी हुई घुंघरूओं की आवाज
लिया करता हूँ मैं सुन

४-
तिल का
कुछ लोग बनाकर ताड़
जहर बुझे तीरों से
करते हैं प्रहार
लेकर उस काल्पनिक वृक्ष की आड़

५-
एक दिवस में
अपने ह्रदय का सारा प्यार
मुझ पर तुम दो वार
इसी दिन का था
मुझे इंतज़ार

६-
तुम्हारी यादों का हैं
कोहरा घना
चाहता हूँ मैं उससे
हमेशा घिरा रहना

७-
तुम्हें वैसे ही मैंने
अपने ह्रदय में हैं रखा
जैसे अर्जुन के
कृष्ण थे एकमात्र सखा


जिसे समझना हैं
वह समझ जाता हैं
यह और बात हैं
लिखना मुझे
कहाँ आता हैं

९-
कभी तुम्हारे रूप से
होता हूँ आकर्षित
कभी तुम्हारे मन से
होता हूँ मोहित
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
मिलन क़ब होगा आखिर
वियोग जिसकी तपस्या हैं
ऐसा हूँ
मैं एक आशिक़

१०-
तुम अनुभवी लहर हो
और मैं हूँ
तटस्थ एक साहिल
तुम्हारी सराहना के बल पर
बन पाया हूँ मैं
तुम्हारे कुछ तो काबिल

११-
चाहो तो तुम ले लो
मेरी परीक्षा
जितना तुम मुझे जानते हो
उससे भी ज्यादा
मैं हूँ
एक व्यक्ति अच्छा

१२-
न जाने कब थम जायेगी सांस
बची रहेगी
पर और और जीने की आश

१३-
तुमने कह दिया कि
मोहब्बत का
मत करना इज़हार
तबसे
मौन की ईटों से
मैंने आपने चारों ओऱ
उठा ली हैं दीवार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

764-"सामना"

"सामना"
 
तुम्हारा स्नेह मुझ पर
बना रहे सदा
यदि राह से
भटक जाऊं यदाकदा
सम्भाल लेना मुझे
एक इंसान हूँ
इसीलिए तो
तुम पर हुआ हूँ फ़िदा

सीधे तुम्हारी रूह तक
पहुँचने के लिए
तुम्हारे तन के अनुपम सौंदर्य
तुम्हारे मन के तीव्र सम्मोहन
से अछूते रहने का
तुम दो मुझे हौसला

हर बार खुद को दोराहे पर
पाता हूँ मैं खड़ा
कभी पूरी होती सी लगती नहीं
क्यों कामना
तुम मेरे लिए सच हो
तुम्हारा ही करना चाहता हूँ
मैं इसीलिए सामना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

763-"मौन "

"मौन "
 

पृथ्वी गेंद हैं
घूमती हैं
पृथ्वी पतंग हैं ,उड़ती हैं
पृथ्वी गिरे तो कहाँ गिरे
उठे तो कहाँ उठे

ग्रह उपग्रह सितारें
और अंतरिक्ष के सभी नज़ारें
एक दूसरे के हैं सापेक्ष
मनुष्य ही करता हैं कोशिश
जीने के लिए निरपेक्ष

बाहर के शून्य के ही जितना
मन के भीतर भी है शून्य
उसे ही महसूस करने के लिए
मिला हैं हमें
यह जीवन अमूल्य

उस खाली से ,सूने से ,मूक से
मौन के सागर में
भरा हैं प्यार का जल
इसीलिए तो
आँखों से हमारे
उमड़ आते हैं
करुणा से ओतप्रोत
अश्रु बूँदें निर्मल

ठीक मृत्यु के पूर्व तक
माँ बेटे बेटी को एक नज़र देखने के लिए
तड़फती हैं
पिता के प्राण भी इसी तरह अटके रहते हैं
नहीं हो पाता हैं मनुष्य , रिश्तों से परे
रूह की आँखों मैं भी
रहते हैं शायद इसीलिए
अपनों के ही चित्र भरे

ज्ञान से और कर्म से
दोनों से बड़ा हैं प्रेम
धागा स्नेह का अटूट रहे
चाहते ,हवा हो या पानी
धरती हो ,अग्नि हो या व्योम

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

762-तुम ही हो प्रिये ......!

तुम ही हो प्रिये ......!


कभी तुम

मुझे सच लगती हो

कभी झूठ



में तुम्हे मनाऊं कैसे ..

तुम तो अक्सर

जाती हो मुझसे रूठ





जान नहीं पाया

अब तक कि ....

तुम्हारा मेरे प्रति

सकारात्मक या

नकारात्मक है रुख



फिर भी मै तुम्हे चाहता हूँ

तुम्हारे सिवा भाया नहीं

मुझे किसी का रूप



मुझे स्वीकार करो या नकार दो

तुम पूनम की चांदनी हो

और मै हूँ अमावश का

अन्धकार .....घुप



मुझे तो रहना ही होगा

इसलिए

बीहड़ के एकांत सा बस चुप



मेरे प्राण की नीरसता को जो सरस कर दे

तुम ही हो मेरे लिए प्रिये ...

वह अमृत बूंद

मेरे ह्रदय के अन्धकार को जो हर ले

तुम ही हो मेरे लिए प्रिये ....

वह धूप



किशोर

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

761-"हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल"

"हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल"



बांहों मे उग आये

काँटों से

दुखी: न हो बबूल



पवन कहें तुमसे

संग मेरे झूम

नदिया कहें

झुलसी टहनियों से

परछाई बन

मेरी शीतल काया कों चूम

महा एकांत के वन के

मौन कों सुन



कराहती हुई पगडंडी के

थके नहीं पाँव

चलती ही चली जाए

इस गाँव से उस गाँव

मानो उसकी अपनी हो

अंतर्लीन कोई धून



मुझसे अभिन्न हो मनुज तुम

कमल पात पर

उछलती -लुढ़कती

यह बात कहें

शबनम की चैतन्य एक बूंद

हरी हरी पत्तिया पीले पीले फूल



kishor kumar khorendra

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

760-तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन


तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन


 
यह प्रेम ..क्या सिर्फ हैं दैहिक आकर्षण

या हैं

तुम्हारे मन के प्रति

मेरे मन का समर्पण

मैं अपनी आंतरिक छवि कों

तभी निहार पाता हूँ

जब मेरे सम्मुख आते हैं

तुम्हारे उज्जवल नयनों के दो दर्पण

एक युवक मेरे भीतर हैं

जो तुम्हारी अंतरात्मा के भीतर छिपी युवती कों

करना चाहता हैं

अपनी निश्छल सम्पूर्णता कों अर्पण

केवल ईश्वर के चरणों में ही नहीं .....

मनुष्य ,..मनुष्य के समक्ष भी

कर सकता हैं ......

अपने अहंकार का विसर्जन

मेरी तीसरी आँख कों इसीलिए हुआ करता हैं अक्सर

तुम्हारे दिव्य रूप का दर्शन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

759-और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत"

और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत"



और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत

तब कही

तुम्हारे व्यवहार में मेरे प्रति

औपचारिकताओं का हो पायेगा अंत

दो कदम कभी

चल भी नहीं पायी हो

तुम आज तक मेरे संग

संकोचवश तुम्हारे गालों पर

कहाँ गुलाल पाया हूँ मैं मल

अब तक लगता रहा हैं

फागुन मुझसे

करता रहा हैं छल

तुम्हरी कोरी चुनरी पर

चढ़ नहीं पाया हैं

मेरे प्यार का गाडा रंग

तुम्हें लिखता आया हूँ

ढेरों पत्र

लेकिन कर न पाया

तुम्हारे मौनव्रत कों मैं भंग

सोच रहा हूँ

कौनसा मै ऐसा लिखूं छंद

की

जिससे आबद्ध हो जाए

तुम्हारा कोमल मन

तुम यदि अप्सरा हो

तो तुम्हारे सौन्दर्य में

ध्यानमग्न ....

मैं भी हूँ एक उमंग

न जाने कब कहोगी तुम

मुझसे आकर

तोड़ दो अपनी तपस्या

अब तक व्यतीत हो चुके हैं

पल क्षीण अनंत

और न जाने कितने बीत जायेंगे बसंत

तब कही

तुम्हारे व्यवहार में मेरे प्रति

औपचारिकताओं का हो पायेगा अंत





किशोर

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

758-"खिल उठते हैं "

"खिल उठते हैं "



जब पतंग की तरह
उड़ा करता था मन
वह था मेरा बचपन

सौंदर्य की आंच से
झुलस जाने को
तरसता था तन
वह था मेरा यौवन

बीत गए मेरी उम्र के
अनगिनत बासंती क्षण
ख्यालों के जल में
अब परछाईयाँ शेष हैं
उन्हीं मधुर पलों के
सायों का
मैं किया करता हूँ
एकांत मैं अनुशरण

जब कोयल की कूक ,
या भवरों के गुंजन
का करता हूँ श्रवण
पंखुरियों पर बैठी हुई
तितलियों सा
मेरी कल्पनाये भी
करती हैं
तब रसमय चिंतन
उस अपरचित सी युवती का
मेरे सपनो में होता हैं
आज भी आगमन
जिसका घर हैं मेरा अचेतन
मेरे मन में छिपी तरुणाई को
आज भी भींगा जाता हैं सावन

मेरी सांसों में
उसकी रूह कि खुश्बू हैं
दोनों के एक ही
लय पर
आबद्ध हैं स्पंदन
आते ही मधुमास के
पलाश सा
खिल उठते हैं
फिर से मेरी
मधु स्मृतियों के सुमन

किशोर कुमार खोरेन्द्र

757-"दो टूक "

"दो टूक "

१-
इश्क़ में होता आया हैं
यही अक्सर
मैंने कभी कुछ कहा नहीं
और तुमने कभी कुछ पूछा नहीं

२-
तुम्हें हर पल मैं करता हूँ याद
इसके अलावा भी कोई तरिका हो
प्यार करने का तो बतलाने के लिए
कर रहा हूँ फ़रियाद

३-
सिवा तुम्हारे किसी से नहीं हैं मेरा नाता
तुम्हें यह पर मैं कैसे समझा पाता

४-
दूर दूर तक हैं कोहरा
सम्भव कहाँ
देख पाना अपना ही चेहरा


पैसे से किसी को
नहीं सकता हैं कोई खरीद
समर्पित होकर ही
बन सकते हैं
हम किसी के मुरीद

६-
जो खो दिया
उसके लिए होता हैं अधिक दुःख
जो मिला हैं
कम हो जाता हैं
इसलिए उसका सुख

७-
यदि किसी से मोहब्बत करते हो
तो रहना चुप
चाहे जीवन बीत जाए
जीते हुए
उसकी इच्छाओं के अनुरूप

८-
स्नेह के तार
कभी न कभी
कहीं न कहीं जाते हैं जुड़
राह पर चलते चलते
किसी न किसी की ओर
हम आखिर में जाते ही हैं मुड़

९-
कोशिश बहुत करता हूँ
की तुम्हे मैं जाऊँ भूल
विरह के पर
चुभते हैं शूल

१०-
सम्मान ,आदर
भी स्नेह का एक रूप हैं
तुम्हारे ही लिए
मेरा शेष जीवन
अब पूरी तरह से
प्रस्तुत हैं

११-
मिल ही जाते हैं कुछ लोग
जो अपने से लगते हैं
ख्यालों में
सपनों में
वे ही अब नज़र आते हैं

१२-
तुम्हारी तस्वीर से
हो गयी हैं मुझे मोहब्बत
तुम्हारी परछाई के
संग ही हैं मेरी सुहबत
तुम्हारे ख्यालों से आबाद हैं
मेरी मोहलत

१३-
आकाश पर छाये रहे बादल
मानो सूरज ने
अपनी आँखों पर
लगा लिया हो काजल

१४-
अपने ह्रदय में दो मुझे स्थान
यही तो हैं वास्तविक जान पहचान

१५-
तुमसे चाहे न हो
कभी मुलाक़ात
या
तुमसे संकोचवश न कह पाऊँ
अपने दिल की बात
पर दूर से ही सही
मुझ पर पड़ते हैं
जो तुम्हारी नज़रों के तीर
वे हैं मेरे लिए अमूल्य सौगात

१६-
तुम्हारी रूह और मेरी रूह
के बीच हैं
कुछ क़िताबें
कुछ पन्नें
कुछ कवितायें हैं
जिन्हें पढ़कर मैं समझ जाया करता हूँ
तुम्हारी किताबें ,तुम्हारे शब्द ,और
तुम्हारी कवितायें मुझे
नहीं लगते अब दुरूह

१७-प्रेम का होता नहीं हैं सबूत
कविता लिखो या न लिखो
प्यार होता हैं अटूट

१८-
तुम पर हूँ मैं
हालांकि फ़िदा
लेकिन रहना तो हैं हमें
आजीवन जुदा जुदा

१९-
कविता के प्रति
काव्य का हैं यह असीम अनुराग
बूझ सको तो बूझ लो
यह नूतन राग
तुम्हारी और मेरी रूह के हैं
यहाँ पर सिर्फ ज़ज़बात

२०-
तुम्हारी कविता कर लेती हैं मुझे आबद्ध
पढते पढते खो जाता हूँ
होकर नि:शब्द

किशोर कुमार खोरेन्द्र