रविवार, 26 जनवरी 2014

755-"अंगड़ाई "

"अंगड़ाई "
 
फूलों पर मंडराने
फिर आ गए मधुप
उड़ने लगे हैं
पराग कणो के धूल
कच्चे आमों की गंध लिए
महकने लगी हैं बयार खूब
महुवा की बूंदों से
भींग गयी हैं सुनहरी स्निग्ध धूप

वन हो या उपवन
या गाँवों
की अमराई हो
गूंज रही हैं वहाँ कोयल की कूक
पलाश का वृक्ष लेने लगा हैं अंगड़ाई
डाल डाल पर
निखर आया है उसका अनुपम रूप
सूनी पगडंडियों पर
गुनगुनाते आ रहा हैं मौसम
ओंठों पर हैं उसके मधुर एक धुन

सुस्त पड़े नगाड़ें कह रहे हैं
मचाएँगे हम सब मिलकर
इस बार फिर से धूम
मन में नहीं रहेगा
किसी के कोई उधेड़बुन
न कोई अंकुश
लहरों को लौट कर मत जाने देना
ऐ किनारों
साँझ की अरुणिमा से आरक्त
उनके गालो को
लेना तुम जरुर चूम

किशोर कुमार खोरेन्द्र