शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

754पल भरमे ........

पल भरमे ........



हां बहुत कुछ हुआ

इस बीच

मुझे पटरिया

समझ कर



वक्त ,कई रेलों की तरह

मुझ पर से गुजर गया

फिर भी मै ज़िंदा हूँ



ताज्जुब है ....

कविता लिखने के लिये

फिर जीना

फिर मरना क्या जरूरी है ..?

अपनी सवेंदानाओ कों जानने के लिये

कभी बूंद भर अमृत

कभी प्याला भर जहर पीना क्या जरूरी है ..?



मुझ लिखे शब्दों कों

कलम की नीब

धार की तरह काटती गयी ....

मेरी पीड़ा

कों फिर वह नीब कहाँ .

शब्द दे पायी

बहुत कुछ सा -मै हर बार ...

अनलिखा भी रह जाता हूँ

भावो का एक ज्वार था ......

जिसके उतरने पर ........

मै अकेला ही था सुनसान किनारे पर

मेरे हाथ मे

मेरे आँसुओं से गीली रेत थी

और हर बार की तरह

मै शेष रह गया था



क्योकी

कविता बच ही जाती है

और ..और .लिखने के लिये

फिर -भी

चाँद मेरी व्यथा कों

समझ नही पाया था

मैंने उसकी किरणों से प्राथना की -

अब तो ..समझ जाए ........वह



किशोर

6 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना...

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत ख्यालो से रची रचना...

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव |

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

kailash ji shukriya

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

sushma ji shukriya

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

imran ansaari ji dhnyvaad