गुरुवार, 16 जनवरी 2014

751-"भोर "

"भोर "

 
भोर होने से ठीक पहले
अपने पंख फड़फड़ाती हैं चिड़ियाँ

किरणों की नौक के चुभते ही
कलियों की
खिल उठती हैं पंखुरियाँ

अंधेरों के छटते ही
सफ़ेद चूने सी
उजागर होने लगती हैं
अनुशासित गगनचुंबी इमारते
और जमीन पर लड़खडाती हुई सी
खडी हुई झोपड़ियाँ

घने कुहरे की आड़ में
दुबकी रहती हैं
ओस से भींगी घास
और ठण्ड से कांपती पत्तियाँ

गाय की ममता छलकने लगती हैं
रम्भाने लगते हैं
बछड़े और बछियाँ

सिरपर गगरी का बोझ रखे
लौटती हुई
दिखाई देती हैं पनिहारिनियाँ

निकल पड़ते हैं कतारबद्ध हो
नीले आसमान में सफ़ेद बगुले
तलाशने वह तट
जहां ज़रा
ठिठकी सी लगतीं नदियाँ

दूर दूर तक नज़र आती हैं
बबूल ,पीपल ,बरगद
या नीम की झुकी हुई
कड़वी डालियाँ

सुबह के रंग में उमंग हैं
शाम को
उदास सी लगती हैं
निस्तब्ध घाटियाँ

थकी हुई सी
धीरे धीरे चलती हुई
लगती हैं फिर से
सूनी पगडंडियाँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

4 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 18/01/2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
कृपया पधारें ....धन्यवाद!

Kaushal Lal ने कहा…

बहुत सुन्दर......

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya yashoda ji

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya kaushal ji