गुरुवार, 16 जनवरी 2014

747-"तू "

"तू "

 
पत्तियों के झुरमुट के बीच से
झांकती हुई एक किरण सी
आज शरमाई हैं तू
धूप के वन में किसी वृक्ष के तले
मेरे लिए
ठहरी हुई परिचित सी
परछाई हैं तू
सूने में अचानक कोयल की कूक से
गूँज उठी
अमराई हैं तू
लहरों की तरह मुझे देखकर
उमड़ आयी
नयी नयी सी तरुणाई हैं तू
दूर पर्वत के उस पार
मेरे इंतज़ार में ठिठकी हुई
एक अंतहीन पगडंडी की
अछूती तन्हाई हैं तू
किशोर

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