गुरुवार, 16 जनवरी 2014

745-"वायदा "


"वायदा "

तुम्हारे और मेरे दरमियाँ
बहुत हैं फासला
मैं जमीं हूँ तुम हो आसमाँ

कभी तुम आग हो
कभी तुम बर्फ की हो प्रतिमा

तुम्हें छूते ही
मैं जल कर हो सकता हूँ राख
या
तुम पिघल कर
नदी की बन सकती हो धार
इस तरह से
असम्भव हो जाएगा
होना हम दोनों का
फिर से सामना

तुम्हारी निगाहें
मुझे अपने करीब


बुलाने की
करती हैं मूक कामना
मैं तुम्हारे मौन को
लिखता रहूंगा
हो सकता हैं मुझे परवाने की तरह
प्रेम की आंच से रहना पड़े
हमेशा झुलसना

लेकिन तुम मेरी परवाह मत करना
तुमसे मेरी यही है प्रार्थना

मैं तुमसे प्रेम करता रहूंगा सदा
बदले में
कुछ नहीं चाहूँगा
यह है मेरा तुमसे वायदा

किशोर

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