गुरुवार, 16 जनवरी 2014

744-"मनगढंत "

"मनगढंत "
 

सुबह के चाय से
अधिक मीठी होती हैं तुम्हारी वाणी

सूरज की पहली किरण
के आते ही उभर आये
वन के मनोरम दृश्य से भी
अधिक लगती हो तुम रूपवाली

ऐसे तो तुम मौन ही रहती हो
पर कुछ न कुछ कहती सी
लगती हैं
झूलती हुई
तुम्हारे कानो की स्वर्णीम बाली

ठंडे जल को गर्म होने के लिए
तुम्हारे यौवन का इंतज़ार रहता हैं
यही कहती हैं नदी की रवानी

तुम्हारी परछाई का स्पर्श पाने के लिए
तरसता रहता हैं
तपस्वी सा एकांतवासी कुंए का पानी

मैं तुम्हे कैमरे की आँख से देखता हूँ
कांच की तरह तुमसे बनाये रखता हूँ
अघुलनशील दूरी
डरता हूँ कही
कोई गढ़ न ले
खामाखाह फिर एक मनगढंत कहानी

किशोर

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