बुधवार, 15 जनवरी 2014

740-"कभी कुछ न कहना"

"कभी कुछ न कहना"
 

एक पत्ता भी खड़कता हैं

तो तुम जाती हो सहम

बूंदें टपकती हैं

तो तुम्हें हो जाता हैं वहम

मन के भीतर जो तुम्हारे

एक और मन हैं

वहा दबे दबे से चलते हैं

तुम्हारे प्यार के कदम

"कभी कुछ न कहना

चुपचाप ही रहना "

शुरुवात में ही मांग लिया था

तुमने मुझसे यह वचन

इसीलिए

तुम्हारे नाम का किये बिना उच्चारण

मै किया करता हूँ तुम्हारा स्मरण

पढ़ता तो जरूर हूँ

कभी गीता ,कभी रामायण

पर

भीतर भीतर

चलता रहता हैं तुम्हारा ही मनन

कोई नहीं जान सकता की

तुम्हारी परछाई से

मेरी परछाई का

प्रतिदिन होता हैं मिलन

क्योंकि मौन कों तुमने और मैंने

कर लिया हैं आजीवन वरण

देखने में तो हम दोनों

अजनबी से लगते हैं

फिर भी हम क्या करे

हम दोनों के एकाकार होने का

कभी कभी

भेद खोल जाया करते हैं

हमारे बोलते से नयन

किशोर

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