बुधवार, 15 जनवरी 2014

739-"दो टूक "

"दो टूक "
 

1-तुम्हारी नज़र में
मैं लाख बुरा सही
पर तुम्हारा रूप मुझे भाया हैं
जैसे एक चाँद
मेरी आँखों की झील में
उतर आया हैं

2-फूल खिलते हैं ,महकते हैं
नज़रे मिलती हैं ,लोग चहकते हैं

3-कागज़ों में मैंने
की थी लिखकर जिसकी चर्चा
उसने पढ़ा नहीं
कभी मेरा कोई पर्चा

4-मेरी तकदीर में
तुमसे न मिलना हैं लिखा
फिर भी
प्यार करना तुम्हीं से
मैंने हैं सीखा

5-मैं रास्ते के साथ रहता हूँ
या
मेरे साथ रहता हैं रास्ता
लोग मुझसे अक्सर कहते हैं
कब तक निभा पायेंगें हम
यह नाता या यह रिश्ता

6-प्रेम के बंधन में नहीं हैं मिलन
अहसासों के संग करते रहो
उन्मुक्त हो विचरण

7-जल रही हैं चिता
फिर भी मन कहाँ
हुआ हैं रीता

8-मन भी ऊन की तरह हैं
उसे जितना बुनो कम हैं

9-तुम्हारी खामोश निगाहों में
छिपा रहता हैं मेरे लिए पयाम
कोरे कागज़ में भी
पढ़ लिया करता हूँ
तुम्हारे अनलिखे क़लाम

10-नींद में तुम हो मीठा सपना
जागरण में
तुम ही तो लगती हो अपना

11-सिवा तुम्हारे कोई न हो
तुम्हीं सुबह की धूप ,तुम्ही शीतल हवा ,तुम्हीं बन जाओ पानी
तुम्ही अक्षर ,तुम्ही शब्द ,तुम्ही प्रेम की कविता
ऐसी हो हम दोनों की बिना शीर्षक की
एक अंतहीन कहानी

12-हो जाने दो मुझे
तुम्हारे इश्क़ में दीवाना
जानूं तो सही कैसे जलता हैं
शमा के आगोश में एक परवाना
तुम तक पहुँचने के बाद
वैसे भी असम्भव हैं
मेरा लौट आना
प्रेमी वही सच्चा हैं
जो मोहब्बत के नाम पर
हो ज़ाया करते हैं फ़ना

13-पूरा दिन यदि एक कप चाय हैं
तो
तुम से हुई क्षण भर की मुलाकात
उसमे घुले हुए एक चम्मच शक्कर की तरह हैं
जिसकी वज़ह से
दिवस में मिठास आ जाती हैं

kishor kumar khorendra

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