बुधवार, 15 जनवरी 2014

738-"अन्तरंग परिचय"

"अन्तरंग परिचय"
 

अक्षर से अक्षर जुड़े

शब्दों से शब्द मिले

छंद सारे

स्याही में घुले

तभी कही जाकर

कोरे कागज पर अंकित

हुए

मेरे प्रेममय भाव

तब तक सोचा न था की

इसे भी कोई पढेगा

किसके मन पर पडेगा

इसका अनुकूल प्रभाव

मेरी नज्मों का तो वैसे भी

एकाकी रहने का हैं स्वभाव

लेकिन तुम थी जिसे शायद

मेरे ही गीत भाय

अनजाने में लिख रहा था

आतंरिक प्रेरणा से प्रेरित हो

मैं तुम्हारे लिये ही

जो तुम्हें ...पसंद आय

मेरे लिये तुम थी अजनबी

फिर भी

तुम मेरे शब्दों का

समझ जाती थी मूल आशय

इस तरह बीत गये कई बरस

अचानक आज मै तुमसे मिला

तो कहने लगा

मुझसे बीता हुआ समय

उन अक्षरों कों उन शब्दों कों

उन छंदों कों उस स्याही कों

उन पन्नों कों

तुम्हारी ही तलाश थी

शायद मेरे मौन से

तुम्हारी खामोशी का

रहा हो आदि काल से

अन्तरंग परिचय

हो सकता हैं तुम्हारे कोरे मन कों

पढ़ लिया करता हो दूर से भी

मेरा अनुरागी ह्रदय

किशोर

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