बुधवार, 15 जनवरी 2014

737-"लो फिर आ रहा हैं बसंत "

"लो फिर आ रहा हैं बसंत "
 

अपनी नर्म उँगलियों से
उठएगा पंखुरियों का घूँघट
समीर मंद मंद
संग लेकर आएगा
जब वह मकरंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

दहकने लगेगा पलाश
अँगीठी के आंच के समीप
दुबकेंगें नहीं हैम
करने तब सतसंग
कम हो जायेगी ठंड
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

खेत खलिहान घर आँगन
सभी को
किले के दरवाजों सा
घने कोहरे कर लेंगे बंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

दूबों पर मोती सा बिखरे रहेंगें
ओस कण अनंत
राहगीर से तब कहेगा पथ
मंजिल तक पहुँचाने का मैंने
नहीं किया है कोई अनुबंध
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

नदी की धारा
लिख जायेगी
रेत के सीने पर
प्यार का एक छंद
बहती हुई स्वछंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

अपना ही रूप निहार कर
लजायेंगी कलियाँ
जब उनकी परछाईयों के
प्रदर्शन के लिए
ठहर जायेंगें कुछ पल के लिए
सरोवरों के जल तरंग
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

उड़ती हुई चुनरी सी लगेंगी बदलियाँ
तोते के पंख
सा होगा
आम के नए पत्तों का रंग
फिर से छेड़ेगी
कोयल अपना मधुर राग पंचम
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत



किशोर कुमार खोरेन्द्र

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