बुधवार, 15 जनवरी 2014

736-और इन सपनो की दुनियाँ में

और इन सपनो की दुनियाँ में



तुम भी इसी चाँद कों देखती हो

इसलिए मुझे -

आकाश में

तुम्हारी आँखों की चमक से

घिरा यह चाँद अच्छा लगता है

मेरी तरह तुम भी -

अपने घर के छत तक

उतर आये ......

बादलो कों छूना चाहती हो

इसलिए मुझे भी -

फिर मेरे आँगन मे आकर .....

उन्ही बादलो से हुई वर्षा मे

भींगना अच्छा लगता है

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

धूप तुम्हें तलाशती है

ताकि

तुम्हारी परछाई कों

मुझ तक पहुंचा सके

पर तुम अपने प्रश्नों के जवाब देते हुए

अपने मन में

यह जान जाती हो

कि -

प्रेम .....देह और मन से परे

शब्दों के द्वारा

की गयी शाश्वत अनुभूति है

और फिर भावो के रस मे

डूबी हुई खो जाती हो

और

पूरे दिन की तरह

मेरी आँखे भी ...बस ..तुम्हें

खोजती भर रह जांती है

लेकिन

चाहे तुम हो

या

तुम्हारी परछाई हो

...का

इन्तजार करना

मुझे अच्छा लगता है

मै कोहरे से कहता हूँ

वह तुम्हारे पास

हर सुबह जाए .

और

तुम्हारी आँखों मे

बंद सपनो कों चुराकर

मुझे दे जाए

आखिर मेरे सपने भी तो

तुम्हारे सपनो की ही तरह होते है

नींद हो या जागरण ...

दोनों ही स्वप्न है

और इन सपनो की दुनियाँ में

तुम्हारा सच सा ...

लगना

मुझे अच्छा लगता है



किशोर कुमार खोरेन्द्र

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