बुधवार, 15 जनवरी 2014

734-दो टूक

दो टूक

१-अकेलेपन के अकेलेपन के अकेलेपन के
एकांत में हैं
सूनेपन का एक वटवृक्ष
जहाँ तुम्हारी यादों की हरी पत्तियों से निर्मित
हैं घनी छाँह
उसी के नीचे  रहता हूँ मैं
तुम्हारे ध्यान में ध्यानमग्न

२-

लिखना तो हैं एक बहाना
अपने मन की बात कैसे भी हो
उन तक हैं पहुँचाना
पर वो कौन है
अब तक नहीं हूँ मैं जाना

३-

बाट जोहते थक गए नयन
पर उनका न हुआ आगमन
बाँध गया है मुझे
तुम्हारी आँखों का सम्मोहन
सुदृढ़ हैं
तुम्हारे साये के
बाहुपाश का बंधन
मेरे मन में
जारी है निरंतर
तुम्हारा ही चिंतन और मनन

४-
याद आता हैं भीड़ में
कोई अपना सा एक चेहरा
वो रहता है तुम्हारा

५-

धीरे धीरे होती हैं
एक दूसरे से जान पहचान
सभी के भीतर दर्द कि एक सी हैं किताब
इस बात को लो तुम जान

६-

कल्पनाओं के क्षितिज के
उस पार हैं मेरा ठिकाना
धूमिल हो चुकी पगडंडियों का
लेकर सहारा
मुझ तक चली आना

७-

कभी हूँ तुम्हारे मन का ख्याल
कभी हूँ ख़्वाब

उठता ही नहीं
तुम्हारे जीवन में
मेरे सशरीर शरीक होने
का सवाल

८-

तुम्हारे ताने
तुम्हारे उलहाने
जीने के लिए मुझे मिले हैं
यही बहाने

९--

तुम भी कह दोगी
एक दिन शायद
प्यार करने वाले होते नहीं
इस दुनियाँ में
किसी कामके लायक

१०-

फेसबुक तो क्या
यह दुनियाँ ही हैं
एक आभास
खुद के सिवा
सम्भव होता नहीं
किसी और का
यहाँ अहसास

११-

हाँ हूँ मैं बदनाम
क्या पता आपके साथ रहूँ
तो हो जाए मेरा भी नाम

12-

तुम मुझे हर तरह से दो नकार
लेकिन मैं तुम्हारे मन के उजाले तक
पहुँच ही जाऊँगा
किसी न किसी प्रकार
तुम्हारी बाँहों में
तुम्हारे आगोश में
मेरा दम निकले
मेरी अंतिम इच्छा को क्या
तुम कर पाओगी साकार

13-

कल तुम चाहे
न रहो धरती में आकाश में
पर तुम सदा रहोगी
मेरे ह्रदय में
मेरे विश्वास में

14-

जब तन्हां छोड़ जायेंगे कूल
तब काम आयेंगें
आपके तारीफों के पुल

15-

हरेक पर नहीं होता
फ़िदा तहे- दिल
किसी एक को ही मानता हैं वह
अपनी मंजिल

16-

आईने पर अब मुझे नहीं
रहा हैं भरोसा
जबसे तुम्हारी आँखों में
उभर आयी मेरी छवि
ने मुझे हैं रोका

kishor kumar khorendra

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