रविवार, 26 जनवरी 2014

756-"मनोकामना "

"मनोकामना "

 
देश के प्रति
मन में हैं भक्ति
संकट आये तो
अपने तिरंगें के खातिर
हम देंगें
अपने प्राणों की आहुति
गंगा सी पावन हैं
हमारी संस्कृति
एक माले में पिरोये गए हैं
अनेक रंग अनेक धर्म अनेक जाति
हिमालय सी सुदृढ़ है
हमारी एकता के लिए सहमति
प्रजा के द्वारा प्रजा के लिए
हैं हमारे राष्ट्र की राजनीति
न कोई भूखा रहे न कोई रोगी
मिले सभी को
कपड़ा मकान और रोटी
इस मनोकामना को पूरा करने के लिए
हे भारत माँ.
हमें दो शक्ति

किशोर कुमार खोरेन्द्र

755-"अंगड़ाई "

"अंगड़ाई "
 
फूलों पर मंडराने
फिर आ गए मधुप
उड़ने लगे हैं
पराग कणो के धूल
कच्चे आमों की गंध लिए
महकने लगी हैं बयार खूब
महुवा की बूंदों से
भींग गयी हैं सुनहरी स्निग्ध धूप

वन हो या उपवन
या गाँवों
की अमराई हो
गूंज रही हैं वहाँ कोयल की कूक
पलाश का वृक्ष लेने लगा हैं अंगड़ाई
डाल डाल पर
निखर आया है उसका अनुपम रूप
सूनी पगडंडियों पर
गुनगुनाते आ रहा हैं मौसम
ओंठों पर हैं उसके मधुर एक धुन

सुस्त पड़े नगाड़ें कह रहे हैं
मचाएँगे हम सब मिलकर
इस बार फिर से धूम
मन में नहीं रहेगा
किसी के कोई उधेड़बुन
न कोई अंकुश
लहरों को लौट कर मत जाने देना
ऐ किनारों
साँझ की अरुणिमा से आरक्त
उनके गालो को
लेना तुम जरुर चूम

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

754पल भरमे ........

पल भरमे ........



हां बहुत कुछ हुआ

इस बीच

मुझे पटरिया

समझ कर



वक्त ,कई रेलों की तरह

मुझ पर से गुजर गया

फिर भी मै ज़िंदा हूँ



ताज्जुब है ....

कविता लिखने के लिये

फिर जीना

फिर मरना क्या जरूरी है ..?

अपनी सवेंदानाओ कों जानने के लिये

कभी बूंद भर अमृत

कभी प्याला भर जहर पीना क्या जरूरी है ..?



मुझ लिखे शब्दों कों

कलम की नीब

धार की तरह काटती गयी ....

मेरी पीड़ा

कों फिर वह नीब कहाँ .

शब्द दे पायी

बहुत कुछ सा -मै हर बार ...

अनलिखा भी रह जाता हूँ

भावो का एक ज्वार था ......

जिसके उतरने पर ........

मै अकेला ही था सुनसान किनारे पर

मेरे हाथ मे

मेरे आँसुओं से गीली रेत थी

और हर बार की तरह

मै शेष रह गया था



क्योकी

कविता बच ही जाती है

और ..और .लिखने के लिये

फिर -भी

चाँद मेरी व्यथा कों

समझ नही पाया था

मैंने उसकी किरणों से प्राथना की -

अब तो ..समझ जाए ........वह



किशोर

pidaa

 

meri kavitaaon ka anuvaad

 

1-তুমি ঠিকেই কৈছিলা

তুমি ঠিকেই কৈছিলা….
তুমি ঠিকেই কৈছিলা
মানুহ অকলশৰীয়া নহয়
তেওঁৰ লগত থাকে তেওঁৰ কল্পনা
কিন্তু তুমি মোৰ কল্পনাত
এটা এটাকৈ
শব্দৰ দৰে কিয় আহি আছা
কোনো গছৰ কথা মোৰ মনত নাই পৰা
নাইবা কোনো ৰাষ্টা দৌৰি
মোৰ পিছে পিছে নাই অহা
এই জীৱনৰ অন্তিম লক্ষ্য
নিবিচাৰিলেও মৃত্যু পাবই লাগিব
এই অপৰিচিত, অজ্ঞাত, টোপালত
তোমাৰ উপস্থিতি…
চিনাকী মহাসাগৰৰ লহৰৰ
বিশাল বাহুৰ দৰে লাগিছে
মোৰ চিন্তাৰ বিয়পি থকা
প্ৰতিটো কণাত তোমাক
পাহাৰৰ ৰমণীয় উপত্যকাৰ দৰে
বিয়পা যেন দেখা গৈছে তোমাক
যদি মই চিন্তাবোৰ জোকাৰিও দিওঁ
তথাপি তুমি
মোৰ শূণ্যতাৰ পৰিধিৰ
কিয় হৈ পৰিব ধৰিছা কেন্দ্ৰ
মই যিমানেই লুকাই সূক্ষ্মৰ পৰা সূক্ষ্মতৰ
হ’বলৈ চেষ্টা কৰিছো
সিমানেই তুমি
মোলৈ আকাশত উৰি থকা মেঘৰ সৈতে মিলি
গঠিত এটি আকৃতিৰ দৰে
মোহনীয়া আৰু সুন্দৰ হৈ পৰিছা
শব্দ, শূণ্যতাৰ
সিপাৰেও কিবা সম্বন্ধ আছেনে..?
যাৰ কোনো নাম নাই?

মূল: (হিন্দী) কবি কিশোৰ কুমাৰ খৰেন্দ্ৰ

অনু: ডঃ মাখন লাল দাস


2-পীড়া




পীড়া...
নিজলৈ জাগিল বিতৃষ্ণা
আয়নালৈ চায়েই
মই মোৰ মুখ ঘূৰাই দিলো
সূৰুযমুখীৰ চেহেৰা
লাগিছে যেন উকা
যেন হৈ পৰিছে
সি পাণ্ডু ৰুগীয়া
প্ৰথমবাৰ অনুভৱ হ’ল
গছত গোলাপৰ ওপৰিও
বহু জোঙাল কাঁইটো থাকে
সৰি যায় পাহিবোৰ
হ’লে সন্ধিয়া
কাঁইটে বিন্ধিছিল
ৰ’দৰ কোমল আঙুলি
বসন্তৰ ওপৰিও
শৰতকালো আছে
যেতিয়া নোহোৱা হৈ যায়
পাত শুকান আৰু হালধীয়া
কিমান ব্যক্তিগত আৰু গোপনীয়
প্ৰতিজন লোকৰ পীড়া
ইচ্ছা কৰিও তাক তেওঁ
ভগাই দিব নোৱাৰে
অকলশৰেই নিজ দুখবোৰ
তেওঁ হয় ব’বলগীয়া
প্ৰেম অনুভৱ কৰাৰো
আছে এক সীমা
আজি ঝংকাৰিত হোৱা নাই
মোৰ মনৰ বীণা
শৰীৰ আৰু মনৰ বেদনাৰ
পৰশ নপৰা আৰু উৰ্দ্ধত
আত্মাৰে আত্মাৰ পৱিত্ৰ সম্বন্ধ
এই বোধ হোৱাৰ পাছতো
আজি লিখিব নোৱাৰিলো
মই এটি নতুন কবিতা
মূল: (হিন্দী)কিশোৰ কুমাৰ খোৰেন্দ্ৰ
অনু: ডঃ মাখন লাল দাস

बुधवार, 22 जनवरी 2014

753-"दो टूक"

"दो टूक"

1-क्या तुम्हें मुझसे
दोस्ती करके हो रहा हैं अफ़सोस
समझ में नहीं आया
तुम्हारे मन में
मेरे प्रति क्यों हैं आक्रोश
मैं तो अक्सर ही रहा हूँ मौन
पर कविताओं में तुम्हें
शब्दों की तरह
लिखता रहा हूँ जोड़ जोड़

2-अजनबी हो या परिचित
बोले कम पर
चेहरे से लगे की
मैं उनसे मिलकर


हूँ प्रसन्नचित

3-मीलूँ कैसे तुमसे
बिना वज़ह बिना बात
पर मुस्कुराते हैं दोनों के नयना
जब भी होती हैं मुलाक़ात

4-ख़तम न हो कभी
तुम्हारा इंतज़ार
वियोग में ही
महसूस होता हैं प्यार

5-नींद में हो तुम
एक मधुर सपन
तुम्हारे मीठे ख्यालों से युक्त हैं
मेरा जागरण

6-तुम्हें मालूम भी हैं या नहीं
तुम्हें हम भूलते कभी नहीं

7-तुम मुझसे पूछती हो
की
मैं इतना कैसे लेता हूँ सोच
तुम्हें पता नहीं
तुम्हें याद करते करते
मैं तो खो चुका हूँ अपना होश

8-मन में तुम
इस तरह से गए हो बस
रूह के ओंठों ने जैसे
चख लिया हो मधु रस

9-मिलते हैं जब भी
दो व्यक्ति
उनमे एक दूसरे के
व्यैक्तित्व के प्रति
हो ही जाती हैं आसक्ति

10-तुम शमा हो
मैं हूँ परवाना
चाहता हूँ तुम्हारे
इश्क़ में मैं जल जाना

11-चाहूँ या न चाहूँ
तुम्हारी स्मृति के
उन्मुक्त जंगल में
मेरे नाम से रोज एक फूल खिलता हैं
पंखुरियां महकती ही हैं
उसकी खुश्बू को
उसके सौंदर्य को
मैं अपनी आँखों को बंद करके
महसूस कर लिया करता हूँ

12-दाल रोटी चांवल
मिल जाए
तब अच्छा लगता हैं
चाँद और चांदनी की स्निग्ध किरणों से
झिलमिलाता
लहरों का आँचल

13-मुझे याद करने के लिए
उन्हें दिलाना पड़ता हैं याद

14-रोज लिखो स्टेटस
तभी तो होगे फेमस

15-इस दुनियाँ की
दोस्ती होती हैं कच्ची
फेसबुक के जहाँ की
होती हैं दोस्ती पक्की

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 18 जनवरी 2014

752-दो टूक

दो टूक



१-
सागर में पहुँचकर
जैसे नदी
उसमे जाती हैं घुल
वैसे ही
मैं तुम्हे पाकर
खुद को गया हूँ भूल

२-

प्रेम में
मिलन की अवधि होती हैं क्षणिक
विरह काल होता हैं अत्यधिक

3-

न कम न ज्यादा
पर
ज़रूर निभाओ
दोस्तों से वादा

4-t

तुम्हारी ख़ामोशी को ही तो
पढ़कर लिखता हूँ
तुम्हीं से तो कविता लिखना
रोज सिखता हूँ

5-
तुम्हारी उपस्थिति का
जब होता हैं अहसास
मन करता हैं
पहुँच जाऊँ उड़कर
तुम्हारे पास

6-
रिश्ते को आखिर तक
निभाना तुम्हारे लिए
न जाने क्यों था कठिन
मुझे तो साँस लेने में भी
तकलीफ हो रही हैं तुम बिन

7-
जिनका मैं नहीं जानता
सही नाम और पता
उनसे भी हो जाती हैं
फेसबुक में न जाने क्यों
गहरी मित्रता

8-
ज़रूरी नहीं हैं यह
की
सभी मुझे करे पसंद
मेरे शब्द मेरे भाव
कुछ लोगो के मन को ही
दे सकते हैं आनंद

9-

दोस्त ही तो
बनता हैं दुश्मन
जुड़ने में नहीं लगता वक्त
अलग अलग होते होते
व्यतीत हो जाता हैं पूरा जीवन

kishor kumar khorendra

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

751-"भोर "

"भोर "

 
भोर होने से ठीक पहले
अपने पंख फड़फड़ाती हैं चिड़ियाँ

किरणों की नौक के चुभते ही
कलियों की
खिल उठती हैं पंखुरियाँ

अंधेरों के छटते ही
सफ़ेद चूने सी
उजागर होने लगती हैं
अनुशासित गगनचुंबी इमारते
और जमीन पर लड़खडाती हुई सी
खडी हुई झोपड़ियाँ

घने कुहरे की आड़ में
दुबकी रहती हैं
ओस से भींगी घास
और ठण्ड से कांपती पत्तियाँ

गाय की ममता छलकने लगती हैं
रम्भाने लगते हैं
बछड़े और बछियाँ

सिरपर गगरी का बोझ रखे
लौटती हुई
दिखाई देती हैं पनिहारिनियाँ

निकल पड़ते हैं कतारबद्ध हो
नीले आसमान में सफ़ेद बगुले
तलाशने वह तट
जहां ज़रा
ठिठकी सी लगतीं नदियाँ

दूर दूर तक नज़र आती हैं
बबूल ,पीपल ,बरगद
या नीम की झुकी हुई
कड़वी डालियाँ

सुबह के रंग में उमंग हैं
शाम को
उदास सी लगती हैं
निस्तब्ध घाटियाँ

थकी हुई सी
धीरे धीरे चलती हुई
लगती हैं फिर से
सूनी पगडंडियाँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

750-"परिवर्तित व्यवहार "

"परिवर्तित व्यवहार "
 

अक्षर शब्द रस
छंद ,और अलंकार
देख कर मेरा परिवर्तित व्यवहार
मुझसे पूछते हैं
कब हुआ तुमसे ,मेरा प्यार

झरता हैं अमलताश
घेर लेते हैं मेरे गले को
पुष्प बनकर हार

पल भर के लिए भी
जाता नहीं मेरे मन से
तुम्हारा विचार

कोई बात नहीं होती
फिर भी
मुस्कुराने लगता हूँ
आँखों की चमक
करने लगती हैं
अनुपम आनंद का इज़हार

शुक्ल पक्ष के चाँद सा
आते जा रहा हैं
शैने शैने मुझमे निखार

अर्जित कर लिया हो मानो
मैंने
प्रकृति प्रदत्त कोई
सजीव उपहार

खुद को देखने के लिए
अब आईने की ज़रूरत नहीं रही
तुम्हारी आँखों में
अपनी खूबसूरती को
कर लिया करता हूँ निहार

किशोर

749-"अवकाश"

"अवकाश"
 

मेरी कलम की पीठ पर
मेरी उँगलियों के निशान हैं
अब तक
एक कोरा पन्ना मेरे बिना
कमरे के हर कोने में
मुझे तलाश चूका होगा
किताबों को यूँ ही
करीने से सजे रहना
अच्छा नहीं लग रहा होगा

घर के आईने ने मुझे
काफी दिनों से देखा नहीं हैं
खिड़की की दीवार से
सटा हुआ गुलमोहर
उचक उचक कर
सूने कमरे को
निहार रहा होगा
झरोखे से आती एक सीधी किरण
सर्च लाईट की तरह
अँधेरे में अकेली खड़ी होगी

दो छिपकलियाँ जो
आपस में लड़ते लड़ते या
प्यार करते करते
मुझ पर धप से
अक्सर गिर जाया करती हैं
सोच रही होंगी - अरे वो कहाँ गया

दरअसल इस बार
मेरे चश्मे ने
मेरी आँखों को पहन लिया हैं
मेरी चप्पल मुझे जहां जहां
ले जा रहीं हैं
मैं वहाँ वहाँ जा रहा हूँ

मैंने अपने मन को
खुला छोड़ दिया हैं
सोच रहा हूँ
शायद इस बार-
नदी को ,सागर को
पढ पाऊँ
वृक्षों से
कोई नयी कहानी सुन पाऊँ
पहाड़ों के शिखर से
लौट कर आयी प्रतिध्वनि से
कुछ सीख ले पाऊँ
किशोर

748-तुमने ठीक ही कहा था"

"तुमने ठीक ही कहा था"


तुमने ठीक ही कहा था

आदमी अकेला नहीं होता

उसके साथी उसके विचार होते हैं

लेकिन तुम मेरे विचारों में

एक एक कर

शब्दों की तरह क्यों आ रही हो

मुझे न किसी वृक्ष की याद आई

न कोई रास्ता दौड़कर

मेरे पीछे पीछे आया

इस जीवन का अंतिम लक्ष्य

नहीं चाहूँ तब भी मृत्यु कों पा लेना ही हैं

मुझ अपरिचित से ,अजनबी से ,बूंद में

तुम्हारी उपस्थिति ..

जाने पहचाने महासागर की लहरों की

विशाल बाँहों की तरह लग रही हैं

मेरे ख्यालों के बिखरे हुए

कण कण में तुम ..

पहाडो की सुरम्य घाटियों सी

पसरी हुई लग रही हो

यदि मै विचारों कों झटक भी दूँ

तो तुम

मेरे शून्य की परिधि का

केंद्र कयों बनती जा रही हो

मै जितना सिमट कर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर

होने की कोशिश कर रहा हूँ

उतनी ही तुम

मुझे आकाश में उड़ते हुए बादलों से मिलकर

बनी हुई एक आकृति की तरह

भव्य और सुंदर लग रही हो

शब्दों से ,शून्य से

परे भी कोई रिश्ता होता हैं ,,?

जिसका कोई नाम नहीं होता

किशोर

747-"तू "

"तू "

 
पत्तियों के झुरमुट के बीच से
झांकती हुई एक किरण सी
आज शरमाई हैं तू
धूप के वन में किसी वृक्ष के तले
मेरे लिए
ठहरी हुई परिचित सी
परछाई हैं तू
सूने में अचानक कोयल की कूक से
गूँज उठी
अमराई हैं तू
लहरों की तरह मुझे देखकर
उमड़ आयी
नयी नयी सी तरुणाई हैं तू
दूर पर्वत के उस पार
मेरे इंतज़ार में ठिठकी हुई
एक अंतहीन पगडंडी की
अछूती तन्हाई हैं तू
किशोर

745-"वायदा "


"वायदा "

तुम्हारे और मेरे दरमियाँ
बहुत हैं फासला
मैं जमीं हूँ तुम हो आसमाँ

कभी तुम आग हो
कभी तुम बर्फ की हो प्रतिमा

तुम्हें छूते ही
मैं जल कर हो सकता हूँ राख
या
तुम पिघल कर
नदी की बन सकती हो धार
इस तरह से
असम्भव हो जाएगा
होना हम दोनों का
फिर से सामना

तुम्हारी निगाहें
मुझे अपने करीब


बुलाने की
करती हैं मूक कामना
मैं तुम्हारे मौन को
लिखता रहूंगा
हो सकता हैं मुझे परवाने की तरह
प्रेम की आंच से रहना पड़े
हमेशा झुलसना

लेकिन तुम मेरी परवाह मत करना
तुमसे मेरी यही है प्रार्थना

मैं तुमसे प्रेम करता रहूंगा सदा
बदले में
कुछ नहीं चाहूँगा
यह है मेरा तुमसे वायदा

किशोर

744-"मनगढंत "

"मनगढंत "
 

सुबह के चाय से
अधिक मीठी होती हैं तुम्हारी वाणी

सूरज की पहली किरण
के आते ही उभर आये
वन के मनोरम दृश्य से भी
अधिक लगती हो तुम रूपवाली

ऐसे तो तुम मौन ही रहती हो
पर कुछ न कुछ कहती सी
लगती हैं
झूलती हुई
तुम्हारे कानो की स्वर्णीम बाली

ठंडे जल को गर्म होने के लिए
तुम्हारे यौवन का इंतज़ार रहता हैं
यही कहती हैं नदी की रवानी

तुम्हारी परछाई का स्पर्श पाने के लिए
तरसता रहता हैं
तपस्वी सा एकांतवासी कुंए का पानी

मैं तुम्हे कैमरे की आँख से देखता हूँ
कांच की तरह तुमसे बनाये रखता हूँ
अघुलनशील दूरी
डरता हूँ कही
कोई गढ़ न ले
खामाखाह फिर एक मनगढंत कहानी

किशोर

743-"निर्णय"

"निर्णय"
 

न उसने कुछ कहा
न मैंने कुछ कहा
लेकिन कुछ न कहने के मौन ने ही
सब कुछ कह दिया

न उसने मुझे देखा न मैंने उसे देखा
इस न देखने की कनखियों ने
सब कुछ दिखा दिया

न उसने मुझसे पूछा
मेरा नाम और पता
न मैंने उससे पूछा
उसका नाम और पता
लेकिन बिना नाम और पते के भी
दो अजनबियों का
गहराई से परिचय हो गया

फिर हम अलग हो गए
कभी न मिलने के निर्णय के साथ
इस निर्णय ने हमें
पर अटूट रूप से जोड़ दिया
किशोर

742-रूप "

रूप "
 

तुम्हें मै किस तरह से पुकारू

किये बिना शब्दों का उच्चारण

क्या तुम सुन लोगी

मौन के मूक स्वरों से

भरा मेरा आमंत्रण

बिना नाम के

बिना आकार के

आखिर तुम हो कौन

जिसका सौन्दर्य मुझे

लग रहा हैं असाधारण

बादलों के रंगों से

अंबर पर

कर लेती हो तुम अपना

नयना अभिराम चित्रण

पंखुरियों सा खिल जाती हो

जब भी छूती हैं तुम्हें किरण

सुबह सुबह

समुद्र तटीय रेत पर

उभर आती हो

बनकर एक दर्पण

मै तुम्हें पहचानता हूँ

पर तुम मुझे नहीं पहचानती

कभी तारों सा ,

कभी चाँद सा

कभी पर्वत शिखरों सा

कभी जंगल सी गुजरती

एक अकेली राह सा

तुम्हें निहारता आया हूँ

और करूँ अब मैं

तुम्हारे रूप का

कितना वर्णन

किशोर

बुधवार, 15 जनवरी 2014

741-"पीड़ा "

"पीड़ा "
 

अपने आप से कतराता रहा
आईने के सामने आते ही
मैंने अपना मुंह फेर लिया
सूरजमुखी का चेहरा
उदास सा लगा
हो गया हो
उसे जैसे पीलिया

पहली बार महसूस हुआ
पौधों में गुलाब के अलावा
ढेरों नुकीले कांटें भी होते हैं
साँझ होते ही
झर जाती हैं पंखुरियाँ

काँटों से चूभ गयी थी
धुप की नर्म उँगलियाँ
बहार के सिवाय
पतझड़ का मौसम भी होता हैं
जिसमे लापता हो जाती हैं
पीली और शुष्क पत्तियाँ

कितनी व्यक्तिगत और गोपनीय
होती हैं प्रत्येक मनुष्य की पीड़ा
चाहकर भी उसे वह
बांट नहीं सकता
अकेले ही अपने दुखों को
पड़ता हैं उसे जीना

प्रेम को महसूस करने की भी
क्या होती हैं एक सीमा
आज झंकृत नहीं हुई
मेरे मन की वीणा

शरीर औए मन के दर्द से
अछूता और परे हैं
रूह से रूह का पवित्र नाता
यह बोध होने पर भी
आज नहीं लिख पाया
मैं एक नयी कविता

किशोर कुमार खोरेन्द्र

740-"कभी कुछ न कहना"

"कभी कुछ न कहना"
 

एक पत्ता भी खड़कता हैं

तो तुम जाती हो सहम

बूंदें टपकती हैं

तो तुम्हें हो जाता हैं वहम

मन के भीतर जो तुम्हारे

एक और मन हैं

वहा दबे दबे से चलते हैं

तुम्हारे प्यार के कदम

"कभी कुछ न कहना

चुपचाप ही रहना "

शुरुवात में ही मांग लिया था

तुमने मुझसे यह वचन

इसीलिए

तुम्हारे नाम का किये बिना उच्चारण

मै किया करता हूँ तुम्हारा स्मरण

पढ़ता तो जरूर हूँ

कभी गीता ,कभी रामायण

पर

भीतर भीतर

चलता रहता हैं तुम्हारा ही मनन

कोई नहीं जान सकता की

तुम्हारी परछाई से

मेरी परछाई का

प्रतिदिन होता हैं मिलन

क्योंकि मौन कों तुमने और मैंने

कर लिया हैं आजीवन वरण

देखने में तो हम दोनों

अजनबी से लगते हैं

फिर भी हम क्या करे

हम दोनों के एकाकार होने का

कभी कभी

भेद खोल जाया करते हैं

हमारे बोलते से नयन

किशोर

739-"दो टूक "

"दो टूक "
 

1-तुम्हारी नज़र में
मैं लाख बुरा सही
पर तुम्हारा रूप मुझे भाया हैं
जैसे एक चाँद
मेरी आँखों की झील में
उतर आया हैं

2-फूल खिलते हैं ,महकते हैं
नज़रे मिलती हैं ,लोग चहकते हैं

3-कागज़ों में मैंने
की थी लिखकर जिसकी चर्चा
उसने पढ़ा नहीं
कभी मेरा कोई पर्चा

4-मेरी तकदीर में
तुमसे न मिलना हैं लिखा
फिर भी
प्यार करना तुम्हीं से
मैंने हैं सीखा

5-मैं रास्ते के साथ रहता हूँ
या
मेरे साथ रहता हैं रास्ता
लोग मुझसे अक्सर कहते हैं
कब तक निभा पायेंगें हम
यह नाता या यह रिश्ता

6-प्रेम के बंधन में नहीं हैं मिलन
अहसासों के संग करते रहो
उन्मुक्त हो विचरण

7-जल रही हैं चिता
फिर भी मन कहाँ
हुआ हैं रीता

8-मन भी ऊन की तरह हैं
उसे जितना बुनो कम हैं

9-तुम्हारी खामोश निगाहों में
छिपा रहता हैं मेरे लिए पयाम
कोरे कागज़ में भी
पढ़ लिया करता हूँ
तुम्हारे अनलिखे क़लाम

10-नींद में तुम हो मीठा सपना
जागरण में
तुम ही तो लगती हो अपना

11-सिवा तुम्हारे कोई न हो
तुम्हीं सुबह की धूप ,तुम्ही शीतल हवा ,तुम्हीं बन जाओ पानी
तुम्ही अक्षर ,तुम्ही शब्द ,तुम्ही प्रेम की कविता
ऐसी हो हम दोनों की बिना शीर्षक की
एक अंतहीन कहानी

12-हो जाने दो मुझे
तुम्हारे इश्क़ में दीवाना
जानूं तो सही कैसे जलता हैं
शमा के आगोश में एक परवाना
तुम तक पहुँचने के बाद
वैसे भी असम्भव हैं
मेरा लौट आना
प्रेमी वही सच्चा हैं
जो मोहब्बत के नाम पर
हो ज़ाया करते हैं फ़ना

13-पूरा दिन यदि एक कप चाय हैं
तो
तुम से हुई क्षण भर की मुलाकात
उसमे घुले हुए एक चम्मच शक्कर की तरह हैं
जिसकी वज़ह से
दिवस में मिठास आ जाती हैं

kishor kumar khorendra

738-"अन्तरंग परिचय"

"अन्तरंग परिचय"
 

अक्षर से अक्षर जुड़े

शब्दों से शब्द मिले

छंद सारे

स्याही में घुले

तभी कही जाकर

कोरे कागज पर अंकित

हुए

मेरे प्रेममय भाव

तब तक सोचा न था की

इसे भी कोई पढेगा

किसके मन पर पडेगा

इसका अनुकूल प्रभाव

मेरी नज्मों का तो वैसे भी

एकाकी रहने का हैं स्वभाव

लेकिन तुम थी जिसे शायद

मेरे ही गीत भाय

अनजाने में लिख रहा था

आतंरिक प्रेरणा से प्रेरित हो

मैं तुम्हारे लिये ही

जो तुम्हें ...पसंद आय

मेरे लिये तुम थी अजनबी

फिर भी

तुम मेरे शब्दों का

समझ जाती थी मूल आशय

इस तरह बीत गये कई बरस

अचानक आज मै तुमसे मिला

तो कहने लगा

मुझसे बीता हुआ समय

उन अक्षरों कों उन शब्दों कों

उन छंदों कों उस स्याही कों

उन पन्नों कों

तुम्हारी ही तलाश थी

शायद मेरे मौन से

तुम्हारी खामोशी का

रहा हो आदि काल से

अन्तरंग परिचय

हो सकता हैं तुम्हारे कोरे मन कों

पढ़ लिया करता हो दूर से भी

मेरा अनुरागी ह्रदय

किशोर

737-"लो फिर आ रहा हैं बसंत "

"लो फिर आ रहा हैं बसंत "
 

अपनी नर्म उँगलियों से
उठएगा पंखुरियों का घूँघट
समीर मंद मंद
संग लेकर आएगा
जब वह मकरंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

दहकने लगेगा पलाश
अँगीठी के आंच के समीप
दुबकेंगें नहीं हैम
करने तब सतसंग
कम हो जायेगी ठंड
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

खेत खलिहान घर आँगन
सभी को
किले के दरवाजों सा
घने कोहरे कर लेंगे बंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

दूबों पर मोती सा बिखरे रहेंगें
ओस कण अनंत
राहगीर से तब कहेगा पथ
मंजिल तक पहुँचाने का मैंने
नहीं किया है कोई अनुबंध
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

नदी की धारा
लिख जायेगी
रेत के सीने पर
प्यार का एक छंद
बहती हुई स्वछंद
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

अपना ही रूप निहार कर
लजायेंगी कलियाँ
जब उनकी परछाईयों के
प्रदर्शन के लिए
ठहर जायेंगें कुछ पल के लिए
सरोवरों के जल तरंग
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत

उड़ती हुई चुनरी सी लगेंगी बदलियाँ
तोते के पंख
सा होगा
आम के नए पत्तों का रंग
फिर से छेड़ेगी
कोयल अपना मधुर राग पंचम
नापसंद करो या पसंद
लो फिर आ रहा हैं बसंत



किशोर कुमार खोरेन्द्र

736-और इन सपनो की दुनियाँ में

और इन सपनो की दुनियाँ में



तुम भी इसी चाँद कों देखती हो

इसलिए मुझे -

आकाश में

तुम्हारी आँखों की चमक से

घिरा यह चाँद अच्छा लगता है

मेरी तरह तुम भी -

अपने घर के छत तक

उतर आये ......

बादलो कों छूना चाहती हो

इसलिए मुझे भी -

फिर मेरे आँगन मे आकर .....

उन्ही बादलो से हुई वर्षा मे

भींगना अच्छा लगता है

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

धूप तुम्हें तलाशती है

ताकि

तुम्हारी परछाई कों

मुझ तक पहुंचा सके

पर तुम अपने प्रश्नों के जवाब देते हुए

अपने मन में

यह जान जाती हो

कि -

प्रेम .....देह और मन से परे

शब्दों के द्वारा

की गयी शाश्वत अनुभूति है

और फिर भावो के रस मे

डूबी हुई खो जाती हो

और

पूरे दिन की तरह

मेरी आँखे भी ...बस ..तुम्हें

खोजती भर रह जांती है

लेकिन

चाहे तुम हो

या

तुम्हारी परछाई हो

...का

इन्तजार करना

मुझे अच्छा लगता है

मै कोहरे से कहता हूँ

वह तुम्हारे पास

हर सुबह जाए .

और

तुम्हारी आँखों मे

बंद सपनो कों चुराकर

मुझे दे जाए

आखिर मेरे सपने भी तो

तुम्हारे सपनो की ही तरह होते है

नींद हो या जागरण ...

दोनों ही स्वप्न है

और इन सपनो की दुनियाँ में

तुम्हारा सच सा ...

लगना

मुझे अच्छा लगता है



किशोर कुमार खोरेन्द्र

735-"ह्रदय के गमले में"

"ह्रदय के गमले में"

 

कभी सूरज की तरह दिन भर
कभी चाँद की तरह रात भर
तुम्हें तलाशता ही रहता हूँ
तुम ठंडी हवा के एक
झोंकें की तरह आती हो
तुम कुछ देर के लिए
खुश्बू सी सांसों में
समा जाती हो
तुम बादलों के झरोखों से
उड़ते हुए नीले आकाश के पतंग की तरह
अपनी एक झलक दिखला जाती हो

तुम्हारे और मेरे बीच
कांच हैं
कांच के विस्तृत फलक के भीतर तुम हो
तुम्हारे और मेरे मध्य
सपनो का कोहरा हैं
कोहरे के अंदर तुम छिपी हुई हो

काश तुम्हारी रूह को मैं
अपने ह्रदय के गमले में रोप पाता

तुम्हारी जड़ों को
अपने भीतर फैलते हुए महसूस कर पाता

किशोर

734-दो टूक

दो टूक

१-अकेलेपन के अकेलेपन के अकेलेपन के
एकांत में हैं
सूनेपन का एक वटवृक्ष
जहाँ तुम्हारी यादों की हरी पत्तियों से निर्मित
हैं घनी छाँह
उसी के नीचे  रहता हूँ मैं
तुम्हारे ध्यान में ध्यानमग्न

२-

लिखना तो हैं एक बहाना
अपने मन की बात कैसे भी हो
उन तक हैं पहुँचाना
पर वो कौन है
अब तक नहीं हूँ मैं जाना

३-

बाट जोहते थक गए नयन
पर उनका न हुआ आगमन
बाँध गया है मुझे
तुम्हारी आँखों का सम्मोहन
सुदृढ़ हैं
तुम्हारे साये के
बाहुपाश का बंधन
मेरे मन में
जारी है निरंतर
तुम्हारा ही चिंतन और मनन

४-
याद आता हैं भीड़ में
कोई अपना सा एक चेहरा
वो रहता है तुम्हारा

५-

धीरे धीरे होती हैं
एक दूसरे से जान पहचान
सभी के भीतर दर्द कि एक सी हैं किताब
इस बात को लो तुम जान

६-

कल्पनाओं के क्षितिज के
उस पार हैं मेरा ठिकाना
धूमिल हो चुकी पगडंडियों का
लेकर सहारा
मुझ तक चली आना

७-

कभी हूँ तुम्हारे मन का ख्याल
कभी हूँ ख़्वाब

उठता ही नहीं
तुम्हारे जीवन में
मेरे सशरीर शरीक होने
का सवाल

८-

तुम्हारे ताने
तुम्हारे उलहाने
जीने के लिए मुझे मिले हैं
यही बहाने

९--

तुम भी कह दोगी
एक दिन शायद
प्यार करने वाले होते नहीं
इस दुनियाँ में
किसी कामके लायक

१०-

फेसबुक तो क्या
यह दुनियाँ ही हैं
एक आभास
खुद के सिवा
सम्भव होता नहीं
किसी और का
यहाँ अहसास

११-

हाँ हूँ मैं बदनाम
क्या पता आपके साथ रहूँ
तो हो जाए मेरा भी नाम

12-

तुम मुझे हर तरह से दो नकार
लेकिन मैं तुम्हारे मन के उजाले तक
पहुँच ही जाऊँगा
किसी न किसी प्रकार
तुम्हारी बाँहों में
तुम्हारे आगोश में
मेरा दम निकले
मेरी अंतिम इच्छा को क्या
तुम कर पाओगी साकार

13-

कल तुम चाहे
न रहो धरती में आकाश में
पर तुम सदा रहोगी
मेरे ह्रदय में
मेरे विश्वास में

14-

जब तन्हां छोड़ जायेंगे कूल
तब काम आयेंगें
आपके तारीफों के पुल

15-

हरेक पर नहीं होता
फ़िदा तहे- दिल
किसी एक को ही मानता हैं वह
अपनी मंजिल

16-

आईने पर अब मुझे नहीं
रहा हैं भरोसा
जबसे तुम्हारी आँखों में
उभर आयी मेरी छवि
ने मुझे हैं रोका

kishor kumar khorendra