शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

732-"प्रणय"

"प्रणय"

वियोग में ही
होता है
प्रणय का अहसास
बरसों पहले
पल भर के लिए ही सही
तुमसे मेरा परिचय हुआ था
इसे भी मानता हूँ मैं
मुझ पर तुम्हारा एहसान
उसी मिलन पर है मुझे नाज़

अन न तुम्हारी परछाई है
न तुम्हारी तस्वीर है
इस जहाँ में तनहा छोड़ गयी हो
यह कह कर की
अब फिर न होगी
कभी तुमसे मेरी मुलाक़ात
मौन हो गए है साज

मेरी मान्यता है
प्यार ,शब्दों का
नहीं होता हैं मोहताज
इसीलिए तो
सुनायी देती है
वादियों में खोयी हुई
तुम्हारी मधुर आवाज

धुंधली सी हो चुकी
तुम्हारी आकृति में
सुबह की रश्मियों की तरह ही
उभर आती है
तुम्हारी मधु सी मुस्कान
तुम्हारी शोख निगाहें
मेरा पीछा करती सी लगती है
इस रहस्य का
नहीं पाया हूँ जान
अब तक मैं राज

कभी किसी अजनबी ने
यह जताकर
किया था मुझसे एतिराज़
प्रेम
कभी खत्म नहीं होता
जीवन से भी लंबी है उसकी राह
उसकी कोई मंजिल नहीं होती
उसका होता है सिर्फ आगाज़

हार कर भी मैं जीत गया हूँ
दर्द के बिना
अधूरा हैं
मेरा अनुराग
तन्हाई की धुंध में
बर्फ सी घुली है
तुम्हारी याद
तुम्हारे और मेरे बीच
झील सी गहरी ख़ामोशी है आज

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

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