शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

730-"हलचल"

"हलचल"

तुम कहती हो मुझ पर लिखना मत
मैं हूँ एक अति साधारण औरत
पर मैं तो हूँ एक लेखक
इसलिए तुम्हारे इस कथन
से नहीं हूँ पूरी तरह से सहमत

तुम्हारे ह्रदय में खिला हैं
सदभावों का shat दलीय कमल
तुम्हारे मन की रोशनी
हर लेना चाहती हैं तम
भविष्य में मृत्यु हैं अतीत में हैं जनम
लेकिन तुम वर्त्तमान के
प्रत्येक क्षण को मानती हो
सचमुच में जीवन

शब्दों से तुम्हें स्नेह हैं
उनमे किंचित भी त्रुटी हो
यह तुम्हें नहीं हैं सहन
तुम्हें पसंद हैं अध्ययन
चिंतन और मनन
और करती रहती हो
सतत आत्म विश्लेषण
एवं औरों के मन का भी निरीक्षण

स्त्रियों के प्रति पुरुषो के भीतर
जो दुर्भावना हैं
नारी को जो समझते हैं सिर्फ तन
महसूस नहीं कर पाते हैं
जो लोग उसकी रूह का वज़न
करना चाहते हैं केवल चीर हरण
ऐसे दू : शासन दुर्योधन से
तुम करती हो नफरत

लेकिन इस आक्रोश से उबलते
व्यैक्तित्व के अंदर हैं
एक युवती
पुष्प की पंखुरियों सी मुलायम
जिसे प्रकृति से प्रेम हैं
तुम्हें भाता हैं ऊगता हुआ सूरज
भागती नदियाँ की कल कल सी
तुम भी तो करती हो हलचल

किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: