शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

729-अवकाश

अवकाश
मेरी कलम की पीठ पर
मेरी उँगलियों के निशान हैं
अब तक
एक कोरा पन्ना मेरे बिना
कमरे के हर कोने में
मुझे तलाश चूका होगा
किताबों को यूँ ही
करीने से सजे रहना
अच्छा नहीं लग रहा होगा

घर के आईने ने मुझे
काफी दिनों से देखा नहीं हैं
खिड़की की दीवार से
सटा हुआ गुलमोहर
उचक उचक कर
सूने कमरे को
निहार रहा होगा
झरोखे से आती एक सीधी किरण
सर्च लाईट की तरह
अँधेरे में अकेली खड़ी होगी

दो छिपकलियाँ जो
आपस में लड़ते लड़ते या
प्यार करते करते
मुझ पर धप से
अक्सर गिर जाया करती हैं
सोच रही होंगी - अरे वो कहाँ गया

दरअसल इस बार
मेरे चश्मे ने
मेरी आँखों को पहन लिया हैं
मेरी चप्पल मुझे जहां जहां
ले जा रहीं हैं
मैं वहाँ वहाँ जा रहा हूँ

मैंने अपने मन को
खुला छोड़ दिया हैं
सोच रहा हूँ
शायद इस बार-
नदी को ,सागर को
पढ पाऊँ
वृक्षों से
कोई नयी कहानी सुन पाऊँ
पहाड़ों के शिखर से
लौट कर आयी प्रतिध्वनि से
कुछ सीख ले पाऊँ
किशोर

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