शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

727-"विलय"

"विलय"

तुमसे जब हुआ परिचय
तब समझ में आया
जीवन का मूल आशय
धड़कने लगा हैं
तुम्हें याद कर
अब मेरा ह्रदय
तुम मुझे जीत गयी हो
तुम्हारे समक्ष मैं
मान लेता हूँ पराजय
स्वीकार किया था मैंने
इस जीवन को एक अभिनय
जबसे तुमसे मिला हूँ
तब से मिट गया हैं
पुर्वाग्रह और संशय
तुम्हारी नज़रों का सम्मोहन
मुझे लगा रहस्यमय
तुम्हारी आत्मा के
अंग अंग में हैं
मधु रस का संचय
तुम्हारे और मेरे प्यार से
ऊँचा नहीं हैं हिमालय
गंगा के उदगम स्थल सा
पावन हैं हमारा प्रणय
मैं एक ऐसा हूँ जलाशय
जिसके
निर्मल और मीठे जल में
तुम्हारी चाँद सी छवि का
हुआ हैं अंतरंग विलय
तुम्हारी रूह से मेरी रूह का
अब हो चूका हैं परिणय
तुम मेरी स्मृति के
निर्जन वन में
मधुर धुन सी गूंजती हो
मेरे लिए तुम ही हो
ताल छंद और लय
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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