शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

724-"कुछ दीवानगी

"कुछ दीवानगी "

तुझमें हुस्न का गुरुर हैं
मुझमेँ इश्क़ का सुरूर हैं

मैं भी पाक हो जाता
यदि मुझे पनाह देती
तेरी पाकीज़गी

मुझमे हैं अब कुछ आवारगी
मुझमे हैं अब कुछ दीवानगी

तेरी ज़रा सी बेरूखी की
वज़ह से मैं
खुद से हो गया हूँ अज़नबी

तेरी दुआ के बगैर
सूनी लगती हैं
मुझे यह पूरी मेरी ज़िंदगी

किसी बुत का नहीं
बस चाहा था मेरी रूह ने
करना तेरी बंदगी
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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