सोमवार, 18 नवंबर 2013

muktak

तुम्हारे मन में उठ ना जाये सवाल डरता हूँ
रख सकोगी कब तलक तुम मेरा खयाल डरता हूँ
तेरी रूह में कशिश हैं मेरी रूह में खलिश हैं
तुम्हें खोने का रह ना जाये मलाल डरता हूँ












ह्रदय जो कहता हैं उसे सीख लेता हूँ
मन जो कहता हैं उसी तरह लिख लेता हूँ
तुम्हें ही पढ़ता ,लिखता समझता रहा हूँ
तुमसे इस तरह अकेले में मिल लेता हूँ

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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