सोमवार, 18 नवंबर 2013

715-"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

"मेरी आत्मा एक नदी हैं"

बिखर जाती हैं जब ज्योत्सना
अम्बर से अप्सरा सी
उतर आती हैं मेरी कल्पना
प्रेम स्नेह ममता और करुणा
के जरिये
देती हैं मुझे वह फिर सांत्वना



लोग कहते हैं
सुकुमार ख़याल को
मेरे मन की आत्म प्रवंचना
नीम सा कितना भी कटु हो
सह लिया करता हूँ
मैं वह आलोचना
इस जहां में कोई भी तो ऐसा नहीं हैं
जो रहे संग सदा
इसलिए मैं नींद में
चुरा लिया करता हूँ रोज
एक खूबसूरत सपना
कोहरे सा प्रगट होकर
सीख लिया हैं ख़्वाबों ने
फिर छटना
मेरी आत्मा एक नदी हैं
रोक नहीं पाता हूँ उसका बहना
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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