बुधवार, 27 नवंबर 2013

721-"वजूद "

"वजूद "
मैं शरीर से
मन से अलग हूँ
शरीर को बदलता हुआ देखता हूँ
मन की बातें निरंतर सुनता हूँ
प्रकृति का अनुपम सौंदर्य मुझे अभिभूत कर लेता हैं
नियति के हिंसक प्रहार को निहारकर
अवाक रह जाता हूँ
दर्द किसी का दूर नहीं कर पाता हूँ
थक हार कर
लौटे हुए पक्षी सा
अपने मन के वृक्ष की खोह में
असहाय सा
दुबक कर बैठ जाता हूँ
नीले सागर की अथाह गहराई
अंतरिक्ष का असीम विस्तार
शिखर पर
बर्फ से आच्छादित ऊँचें पर्वत
सागौन और साल के घने जंगल
रास्ता तलाशती सी
सूनी सहमी सी अनेक पगडंडियाँ
बदहवाश सी
शहर की असंयमित सी सड़कें
धरती से उठकर आकाश छूने को तत्पर
मनुष्य के भीतर की
जगमगाते सितारों सी अनंत इच्छायें
अंतहीन और व्यापक हैं यह सब परिवेश
मैं यह शरीर नहीं हूँ
क्योंकिं इसे कल राख होना हैं
मैं यह मन भी नहीं हूँ
जिसकी कामनाएं कभी पूरी नहीं होती
मैं तो जैसे
अखिल सौर मंडल में स्थित पृथ्वी के सदृश्य
एक गोल खारा बूंद हूँ
उड़ती हुई गुबार का एक कण हूँ
मधु मय ओस सा अभी हूँ
अगले पल नहीं भी हूँ
धुंध सा सभी को अपनी बाँहों में भर कर
प्रेम देकर लापता हो जाता हूँ
तो क्या मैं हूँ ही नहीं
फिर अपने वजूद के लिए जिद्द क्यों
मान क्यों नहीं लेता की
मैं हूँ ही नहीं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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