मंगलवार, 12 नवंबर 2013

713-"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

"तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ"

वह प्रतिरूप जो
तुम्हारे मन के भीतर रहता हैं
मेरी जान पहचान उसी से हैं
उसी सेबातें कर
मैं कवितायें लिखता हूँ
वही तुम हो
मैं भी जो बाहर से दिखाई देता हूँ
वह नहीं हूँ
मेरे अंतर्मन के अन्दर मेरा
असली रूप रहता हैं
जिस तरह तुम अपने नश्वर तन
चंचल मन से परे हो
उसी तरह मैं भी
धरती और आसमान जहाँ
मिलते से दिखाई देते हैं
उस क्षितिज के उस पार से
तुम्हें पुकारता हूँ........



तुम चाहती हो
की मैं तुम्हारे लिये छंद रचता रहूँ
और तुम
मेरे छंदों से आबद्ध होती रहो
मैं गीत गाता रहूँ
और तुम उसे सुनती रहो
मैं धुन हूँ
तुम नृत्य हो
मैं बांसूरी हूँ
तुम तान हो.
मै और तुम
एक के एकांत में
समाहित हैं
परन्तु
दुनियाँ में अलग अलग
होने का अहसास ही
वह दर्द हैं
जिसके वशीभूत .......
मैं अपने निपट अकेलेपन कों
भुलाने के लिये
तुम्हें गुनगुनाने लगता हूँ

तब तुम्हारे
देह की खुश्बू से
मेरे ह्रदय के कमरे महकने लगते हैं
तुम मेरी आत्मा की देह हो
क्या तुम्हें भी ऐसा लगता हैं
यह रिश्ता शब्दों द्वारा
अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता
हालाँ की
तुम्हें कभी कभी यह भ्रम होता हैं
की मै तुम्हारे बालों कों
गालों कों
छूना चाहता हूँ

बात ऐसी नहीं हैं ...
मैं तुम्हारे निराकार स्वरुप कों
अपनी कल्पना से साकार कर
उसकी निगाहों में
अपनी छवि निहारना चाहता हूँ

एक कवि का प्यार
बाह्य कभी हो ही नहीं सकता
मै तुमसे तुम्हें मांग लूंगा
एक दिन ....देखना

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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