सोमवार, 4 नवंबर 2013

711-"चिर अहसास"

"चिर अहसास"

कहीं  मैं वह तो नहीं हूँ
जो
तुम्हारे घर की  छत पर
कटी हुई पतंग सा आ गिरा था

आँगन में उड़ते उड़ते पहुँचे हुए
एक आवारा पत्ते सा
तुम्हारी शरण में आ दुबका था

एक तिनके सा
तुम्हारी आँखों को चुभ गया था

वर्षा की  बौछार बन
तुम्हारे दामन को भींगा गया था

आईने में  एक चिर परिचित
प्रतिबिम्ब के सदृश्य उभर आया था

या जो

कमरे के  कोने में
तुम्हारी आशंकाओं  के जालों सा
फ़ैल गया था

तुम्हें काफी दूर से
कोयल की मधुर आवाज की  तरह
लगा था

या जिसे सरोवर में खिल आया
कमल समझकर
तुमने तोड़ लिया था
जिसे तुमने जलेबी के रस से नम
अखबार के टुकड़े मेँ
छपी हुई कविता सा
पढ़कर कंठस्थ  कर लिया था

मैं हर वही  यादगार लम्हा हूँ
जो तुम्हे पसंद हैं
कभी आकाश में
चहल कदमी करते हुए
बादलों का समूह हूँ
जिनके द्वारा निर्मित
विभिन्न आकर्षक  आकृतियों को
निहारते हुए
तुम स्व्यं  को विस्मृत कर जाती हो
कभी न लौट कर आनेवाला
नदी का प्रवाह हूँ
जिसकी वजह  से तुम

मन मसोस कर रह जाती हो

ख़ैर मैं  जो भी था
अब तुमने
एक कोरे कागज़ के समान
अपने मन के दराज  में
मुझे सुरक्षित रख लिया हैं
वक्त मिलने पर
अपनी इच्छा अनुसार पढ़ लेती हो
यह सोचकर की
मुझमे वही लिखा हैं
जो तुम्हारे हृदय  में  हैं
हालाँ कि मैं
एक कोरा कागज़ ही हूँ
कहीं मैं
वह इंतज़ार तो नहीं हूँ
जिसमे आगंतुक का
न कोई चेहरा होता हैं न नाम
जिसमे होता हैं बस
बिछड़े होने का चिर अहसास

किशोर कुमार खोरेन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

भावो का सुन्दर समायोजन......

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u sushma