रविवार, 3 नवंबर 2013

709-"प्रकृति "

"प्रकृति "

बीज में छिपी होती हैं
मजबूत जड़ ,हरी पत्तियाँ और टहनी
बूंद में समाहित हैं
वीरान तट ,चंचल लहरें और नदिया गहरी
रज कण में चलती हैं
वे पगडंडियाँ जो ,कभी न थकी न ठहरी
तारों को पता हैं
अतीत की सारी बातें साहसी और सहमी
मन के भीतर हैं
चेतना का हर स्तर उच्चतम और सतही
नियम शाश्वत हैं
सूर्योदय ,सूर्यास्त और चन्द्रमा की आभा
कभी बड़ती तो कभी हैं घटती




यही हैं संसार की नियति
मछली जल से बाहर
नहीं हैं रहती
दुःख हो या ख़ुशी
आँसू की बूंदे नमकीन ही हैं लगती
विचार के अनुरूप नहीं होता जीवन
जन्म और मृत्यु से परे हैं
प्रकृति की रहस्यमयी सहमति
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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