शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

706-मुक्तक

जब भी मैं जीता कोई हार गया था
कड़ी मेहनत से बाजी मार गया था
भ्रमवश मुझे अहंकार हो गया
था
 जाना सबको हैं कहा कई बार गया था



वह चंदा सी खूबसूरत हैं पर उसमें चमक ज्यादा हैं
वह फूलों सी सुकुमार हैं पर उसमें महक ज्यादा हैं
कलाई में रंगीन चूड़ियाँ हैं पर उसमे खनक ज्यादा हैं
मिलन असम्भव हैं मेरे मन में कसक ज्यादा हैं


तुम्हारे शहर से रेल सा गुजरता हूँ अच्छा लगता हैं
तुम्हारा जिक्र हो तो उसे सुनता हूँ अच्छा लगता हैं
सपनों मेंख्यालों में तुम्हे बुनता हूँ
तुम्हारे पद चिन्हों पर रुकता हूँ अच्छा लगता हैं

तुम्हे दूर से देखा हूँ परिचय नहीं हैं
अनदेखा कर दो मुझे शिकायत नहीं हैं
रुबरु न मिलों इस पर विस्मय नहीं हैं
इश्क़ एक जूनून हैं यह अभिनय नहीं हैं



 इस जहाँ में कोई तो होगा एक शख्स
मेरे जैसा 
मन दर्पण में जिसके होगा एक काल्पनिक अक्स मेरे जैसा 
मृदु कविताओं से जिसे होगा बेहद इश्क़
तन्हाई में जीने की आदत होगी जिसे बेशक
मेरे जैसा 

 वो शहर वो गलियां वो मोड़ वह उपवन
मुझे याद हैं
 प्यार की मीठी बूंदों से भींगी थी नस नस वह सावन मुझे याद हैं
तुम्हारी रेशमी जुल्फें सुन्दर रुख मृग से दो नयन
अगले जन्म में फिर मिलने का दिया था वह वचन
मुझे याद हैं



 

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