मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

702- माहिया

 माहिया
हुआ ना कर बेज़ार
रहता आया हैं
आपका ही इंतज़ार


बाहर सब कुछ माया 
मन की सुन्दरता 
न कभी है भरमाया


नर मय हैं नारायण
रावण असत्य हैं
रोज पढ़ें रामायण

उड़ जाती हैं रंगत
रहना सब मिलकर
करना अच्छी संगत


कुसंग साथ नहीं हो
जहरीला हैं वह 
अमृत होता सुसंग


ना हैं कोई दूजा
बेजान संग हैं

करता तेरी पूजा



अमर रहेगी आत्मा 
नश्वर हैं काया 
ह्रदय  me परमात्मा 
किशोर

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