मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

701-"महफूज़ "

"महफूज़ "
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए
न कोई बंदिश हो
न ही कोई तखल्लुफ़  हो पाए
उतार कर देहरूपी परहन
छोड़कर मन के अलंकृत प्रलोभन
रूह की पवित्र नदी में
गहरे तक डूब जाए
प्रेम पथ में साथ साथ
इस तरह चले कि
तुम्हारे आँचल को
मेरी कमीज़ कभी छू न पाए
ताकि
ऐसा कभी न हो कि
एक दूसरे   से
हम दोनों रूठ जाए
जो तुम कहना चाहती हो
तुम्हारी जुबाँ तक आकर
न रुक जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

न मैं दिखावा करूँ
न तुम करना संकोच
खामोश रहते रहते
ऐसा न हो एक दिन
हम विमुख  हो जाए
तरीकत  के लिए
जरुरी हैं कि
अंतर्मन की सभी रहस्यमयी गाँठें 
एक दूसरे के समक्ष  खुल जाए
समर्पण इस कदर हो कि
हम एकाकार ,एकरूप हो जाए

आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

तुम्हारी हथेली की गहरी लकीरों में
मेरी हथेली की उथली लकीरे
गुम  हो जाए
तुम्हारी आँखों में मेरा अक्स दिखे
मेरी निगाहों में ,हे महरुख ....!


तेरा ही नूर नज़र आए
न उल्फ़त घटे ,न कशिश कम हो
क्यों न
हिज्र फिर से बरसों तक
बदस्तूर जारी रह जाए
तुम कस्तूरी हो ,मैं चन्दन हूँ
दुनियाँ  के इस जंगल में
महक हमारी सदा
महफ़ूज  रह जाए
आओं बेतकल्लुफ़  हो जाए

@किशोर कुमार खोरेन्द्र
{ बेतकल्लुफ =स्वाभविक ,अंतरंग ,बंदिश =बंधन ,तखल्लुफ़ =प्रतिज्ञा भंग होना ,
तरीकत =आत्म शुददी ,हिज्र =वियोग ,बदस्तूर =यथावत , महरुख =चन्द्रमुखी ,या नायिका महफूज =सुरक्षित }