शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

697-"जीवन "

"जीवन "

पक रही हैं धान की फसल
खेतों में जैसे बिछ गया हैं
दूर दूर तक स्वर्णिम आँचल
कच्ची बालियों के ऊपर बैठी
एक नन्हीं चिड़ियाँ

सोच रही हैं हवा के झोंकों में
क्यों नहीं हैं हलचल
मेड़ों पर ठहरे हुए से पदचिन्ह
भयभीत हैं
गीली मिटटी में कहीं
उनके पाँव भी न जाए फिसल

छोटे छोटे गड्डों में
समाये हुए हैं
अंबर के भीमकाय बादल
तालाब की सतह से
शीश उठाये झांक रहे हैं
रह रह कर
खिले हुए नीलकमल
बबूल की शाखों पर मौसम ने
हल्दी सा छिड़क दिया हैं
पीली पंखुरियां सुकोमल
धूप में तपकर
सूरजमुखी की सुन्दरता
और गयी हैं निखर


पलाश की हथेली सी पत्तियों पर
सौभाग्य की अमिट रेखाएँ
आयी हैं उभर 
 
अतिथि की तरह अचानक
टपक पड़ता हैं आकाश के छत से
बूंद बूंद भर जल
सुबह सुबह कोहरे की
घनी परतों को भेदकर
सूरज भी नहीं पाता हैं
आजकल निकल


नदी की
लहराती मंथर गति को देखकर
चट्टानों का
दिल भी जाता हैं मचल
ऐसे में परछाईयों को भी
एक दूजे से प्यार हो गया हैं
उनका ह्रदय भी हैं विकल


भोर से गए पंछी आये या नहीं
चिंतित संध्या के माथे पर हैं बल
मनुष्य मनुष्य से
करते हैं अक्सर छल
प्रकृति तो हैं
सीधी साधी और सरल
अनुशासित और शाश्वत हैं
उसके नियम अटल
दुःख और सुख के बराबर बराबर
अनुभवों में विभाजित हैं जीवन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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