गुरुवार, 26 सितंबर 2013

687-एक बूंद


एक बूंद 

साथ चलती रही डगर 
किनारों पर 
चुपचाप खड़े रहे शज़र 
पीछे छूटते गए मील के 
अबूझ पत्थर 
अजनबी सा लगा 
ऊँची ऊँची इमारतों से बना 
निर्दयी शहर 
अपनी ही मनमानी करता हुआ 
दूर चला गया निर्झर 
लौट कर फिर नहीं आउंगी 
कह गयी 
समय की नदी की 
अछूती सी लहर 
पत्तियों से छनकर 
आती किरणों की बूंदों से 
घिरा रहा 
मौनव्रत लिया हुआ दोपहर 
मेरे मन की घाटियों में 
गूंजते  सवालों का 
कहीं से नहीं आया प्रतिउत्तर 
झील में उतर आये चाँद के प्रतिबिम्ब को 

मिटा गया तीव्र पवन का कहर 
तिमिर के दर्द से कोई अवगत नहीं हो पाया 
रौशनी  करने के लिए 
जंगल में तन्हा  भटकता रहा एक शरर 
खामोशी के विराट सरोवर में 
तुम्हारी स्मृति की एक बूंद 
विस्तृत होकर 
बन गयी मेरी हमसफ़र 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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