सोमवार, 16 सितंबर 2013

684-"खुशनसीब "

"खुशनसीब "

दर्द के वृहत उपन्यास जैसे 
मेरे जीवन के 
किसी पृष्ठ पर छपी हुई 
तुम 
एक खुशगुवार कविता हो
जब भी मुझे अवसर मिलता हैं
मेरी यही ख्वाहिश होती हैं
कि
मैं तुम्हे पढ़ लूँ

जब
गर्दिश के गुबार मुझे
घेर लेते हैं
पतझड़ के वन की तरह
मैं उदास और अकेला हो जाता हूँ
अकारण ही पूरी दुनियाँ
मेरे खिलाफ हो जाती हैं

तब
अतीत के किसी सुरम्य मोड़ पर
तुमसे हुई
एक छोटी सी मुलाकात के दौरान
तुम्हारे और मेरे बीच
संकोच की लम्बी सी खामोशी को
याद कर
मैं खुद को खुशनसीब
समझने लगता हूँ

एकाएक
आसपास के द्रश्य
खुशनुमा हो जाते हैं 




मेरी स्मृति की
खूबसूरत वादियों में
स्थित वह खामोशी
मेरी चेतना में
महकने लगती हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र