सोमवार, 9 सितंबर 2013

682-" उनकी दोस्ती "

" उनकी दोस्ती "

लोग ऐसे भी जाते हैं मिल 
लगता हैं 
उनके साथ रहो सदा हिलमिल 
उन्हें 

देखे बिना बीते न एक भी दिन
नया लिखने के लिए
उनकी बाते करती हैं प्रेरित
जानते हैं वे मेरे ह्रदय की पीर
अन्तरात्मा को पढ़ लेने में
वे होते हैं माहिर
ऐसे मित्र दूर रह कर भी
होते हैं दिल के करीब
ऐसे मन से मन के रिश्ते
जो होते हैं ताहिर
को -
करना नहीं होता हैं साबित
पर ऐसे लोग
कुछ ही होते हैं
जिन्हें अपनी दिनचर्या के
आवाश्यक अंग की तरह
कर लिया करते हैं
हम , शामिल 


उनकी दोस्ती
किताबों से बढ़कर होती हैं
वे खुबसूरत वादियों सा
साथ होते हैं
लगता हैं मानों
हो गहन तिमिर
और
जल उठा हो एक कंदील
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

{tahir =pavitr }