सोमवार, 9 सितंबर 2013

681-"मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ "


"मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ "

कभी 
दरख्तों  की बाँहों  पर 
तुम्हारा नाम लिख दिया करता हूँ 

कभी 
जिस राह से तुम गुजर चुकी होती हो 
उस राह में 
तुम्हें महसूस करने के लिए -
उड़ते  हुए  गुबार के वृत्त से 
घिर जाया करता हूँ 

कभी 
एक  कोरे कागज़ को 
तुम्हारे पास छोड़ आया करता हूँ 

कभी 
तुम्हारे मंदिर पहुँचने  से पहले 
सीढ़ियों  पर बिखरे 
कंकड़ों  को चुनकर 
हटा  दिया करता हूँ 

इस तरह 
गुस्ताखियों के जरिये 
अव्यक्त रूप से तुम्हारे समक्ष 
मैं किया करता हूँ 
अपने ह्रदय के प्रेम को जाहिर 


मेरी वफ़ा पर यकीन  करने के बदले 
तुम्हे मुझ पर क्यों 
हो गया हैं वहम आखिर 
मैं तो तुम्हारा हूँ आशिक़ 
मैं नहीं हूँ शातिर 

मैं बुझे हुए चिराग का था तारीक 
जिसने मुझे रौशन किया 
तुम वही  हो आतिश 

तुम आरिफ: हो 
मैं नहीं हूँ आरिफ़ 
तुम्हारा वास्ता ईश्वर से हैं 
मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ 
तुम्हारे अनुपम व्यैक्तित्व  की 
इसीलिए मैं -
किया करता हूँ अक्सर तारीफ़ 

अपनी ख़ामोशी  के आकाश में 
मेरे मौन के बादलों को कर लो शामिल 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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