रविवार, 8 सितंबर 2013

680-"कविता बच ही जाती है"

"कविता बच ही जाती है"

अपनी सवेंदानाओ कों 
जानने के लिये
कभी बूंद भर अमृत
कभी प्याला भर जहर 
पीना जरूरी है
मेरे लिखे हुए शब्दों कों
सुधारने के लिए
कलम की नीब की धार
काटती गयी ....
मेरी पीड़ा
कों फिर वह नींब हुबहू कहाँ .
नए शब्द दे पायी
बहुत कुछ सा हर बार ...
अनलिखा भी रह जाता हैं
भावो का एक ज्वार था ......
जिसके उतरने पर ........
मै अकेला ही था
कभी समुद्र में बिना कश्ती
और बिना पतवार के
या किनारे पर
टूटे है घरौंधों की तरह क्षत -विक्षत
मेरी मुट्ठी में
वक्त की फिसलती हुई रेत थी
और हर बार की तरह
मै वक्त के हाथों पराजित होकर
फिर शेष रह गया था
क्योंकि
कविता बच ही जाती है
और ..और .लिखने के लिये
किशोर कुमार खोरेन्द्र



2 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

kailash ji shukriya