शनिवार, 7 सितंबर 2013

679-धूप से सने आईने हैं हज़ार


धूप से सने आईने हैं हज़ार



मन हैं एक सितार
इच्छाएं हैं उसके तार
चाहूँ तो उन्हें मैं न छेडू
पर सभी लोग जैसे जीते हैं
अपने अपने अनुसार
वैसे ही हैं
मेरे भी मनोविकार

लगता हैं जैसे मैं
पल पल परिवर्तीत होता साया हूँ
और यहाँ तो
धूप से सने आईने हैं हज़ार




घिरा हूँ
अपने ही सुर से ,अपनी ही लय से
मेरी अपनी ही हैं ताल
मुझे लगते हैं वे मधुर
पर सब कुछ पा लेने की धुन ..
बना जाती हैं भीतर भीतर ही
कभी कभी मुझे क्रूर ,
अपने ही ईमान के  खिलाफ

आवाजों की परिधि तोड़ कर
बाहर निकलने का तरिका
मुझे नहीं हैं ज्ञात
जाता जरूर हूँ सच के क्षितिज तक
पर लौट आता हूँ हार

अपनी इन आँखों से
देख नहीं पाता हूँ उस पार
अपने कानों से सुन नही पाता हूँ
शाश्वत मौन की मीठी पुकार

जानता हूँ ..
मै न शब्द हूँ न हूँ विचार
मैं सिर्फ छोटा सा घर नहीं हूँ
रूह सा हूँ
संगमरमर के पत्थरों से निर्मित
एक गगनचुम्बी मीनार

शब्द से ,विचार से
घरसे ,परिवार से
चित्त से ,बुद्धी से ,अहंकार से ,
यहाँ तक की अपने आप से
परे हूँ ...मै एक  मौलिक इंसान

मेरे ह्रदय के प्रेम का
चाहता हूँ  करना हे अनामिका 
तुम्हारी आँखों के दर्पण में दीदार

कभी न कभी तो मिल जाएगा
मनोवांछित ..
तुमसे वह अनंत सा असीम प्यार

तुम्हें देख कर ही तो
आते हैं भाव
तुम्ही वह हो श्रृंगार
जिससे अभिभूत होने पर
मै रसमय हो जाता हूँ
अलंकृत हो जाता हूँ
और इसलिए
मुझमे आ जाया करता हँ
स्वाभविक रूप से निखार
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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