शनिवार, 28 सितंबर 2013

690-"वफ़ा"

"वफ़ा"

जज्बएदिल का खुतूत हूँ 
शब्दों में मेरे 
इश्क़  का जुनून हैं 
पढ़कर जिसे 
छा जाता सुरूर है 

ख़्वाबों का खुशरंग हूँ 
साकार सा लगे 
ऐसा तसव्वुर हूँ 
खुश्बू  हूँ 
उल्फ़त का तरन्नुम  हूँ 

मैं तुम पर निसार हूँ 
इसलिए मुझे 
गुनाहगार न समझों 
मैं नहीं कुसूरवार  हूँ 
हिज्र का नसीब हूँ 
इसलिए तुमसे बहुत दूर  हूँ 

मुझ तक कोई नहीं पहुँच पायेगा 
मैं उफ़ुक   हूँ 
फिर भी अपनी वफ़ा को 
निभाने के लिए मशहूर हूँ 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 



शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

689- "समर्पण "


 "समर्पण "

तुम्हें ऐसा क्यों लगता हैं कि 
मैं तुम पर डोरे डाल  रहा हूँ 
तुम्हारे करीब और करीब आने का 
प्रयास कर रहा हूँ 
तुम्हारे ओंठ अक्सर 
कली  की पंखुरियों की तरह बंद होते हैं 
कभी कभी  तुम्हारा चेहरा 
कमल की तरह खिला हुआ नजर आता हैं 

ऐसे तो तुम मेरे लिए अजनबी ही हो 
फिर भी मैंने तुहारी निगाहों में 
अपने लिए चिर परिचित सी पहचान देखी  हैं 
इसीलिए मैं तुम्हारे विषय में 
यह सब सोचने का ससाहस  कर पा रहा हूँ 

मेरे खाली  समय के आँगन में 
तुम परी सी आ धमकती हो 
सूने कमरे में तब 
तुम्हारे काल्पनिक आगमन की महक 
मेरे इर्द गिर्द 
अगरबत्ती के धुंए की तरह फ़ैल जाती हैं 
पानी में धूप की स्वर्णीम लकीरों की तरह 
तुम्हारा सौन्दर्य झिलमिलाने लगता हैं 
चारों ओर  जीवंत प्रकाश पसर जाता हैं 
बादल धुनें हुए कपास की तरह 
सफ़ेद दिखाई देने लगते हैं 

पाँव डगमगाने लगते हैं 
ऐसा महसूस होता हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर 
कुछ क्षण के लिए घूमना भूल गयी हैं  
गुलमोहर का रंग  और गहरा जाता हैं 
शाखों की पत्तीयाँ  
मुझे छूने के लिए झुकी झुकी सी लगती हैं 
सूरजमुखी मुझे आश्चर्य से निहारने लगती हैं 

उमंग और प्रसन्नता से मेरा चित्त 
भर उठता हैं 
लेकिन तुम मुझमे आये इस परिवर्तन से 
अनभिग्य रहती हो 
तुम्हारे रूप और व्येक्तित्व के प्रति 
मेरा यह आकर्षण 
मेरा यह समर्पण 
नितांत व्येक्तिगत और इकतरफा हैं 

मेरी इस उपासना को 
मेरी इस आराधना को 
मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता 
तुम कभी दृश्य हो 
और कभी अदृश्य हो 
तुम कभी साकार हो 
और कभी निराकार हो 
तुम प्रतिबिम्ब हो 
इसलिए तुम ही 
वन्दनीय बिम्ब भी हो 

मेरे ह्रदय के मंदिर में 
तुम्हारी ही रोशनी व्याप्त हैं 
मेरे मन के वन में 
तुम ही चन्दन  के वृक्ष की तरह 
ऊगी हुई हो 
तुम चन्द्रमा हो 
और मैं बादल 
तुम्हारे नूर से मैं प्रकाशित हो रहा हूँ 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

688-"पिंजरा "

"पिंजरा "

मेरे लिए तुम 
 सूदूर आकाश में 
बादलों से बनी सुंदर आकृति हो 
मेरे लिए तुम 
पेड़ों  के झुरमुट में 
अपरिचित साए की हलचल   हो 
मेरे लिए तुम 
पतझड़ के वीरान जंगल में 
 अब तक 
पलाश का खिला हुआ सूर्ख पुष्प हो 
मेरे लिए तुम 
पर्वतों की श्रंखलाओ के बीच  से 
निकल आयी नूतन आशा की 
एक धूल धूसरित पगडंडी हो 
मेरे लिए तुम 
छिटकी हुई चांदनी हो 
जिसके स्निग्ध उजाले में 
मैं अपना सफ़र तय कर रहा हूँ  
पता नहीं मेरे जीवन यात्रा के रेगिस्तान में 
तुम मृगतृष्णा हो 
या 
सचमुच में मीठे जल से भरी हुई एक नदी हो 
?…
मैं तुम्हारी यादों से घिरकर 
स्वयं को उन्मुक्त महसूस करता हूँ 
न देह रूपी पिंजरा  रहता  हैं 

न जकड़े रहने का भय रहता हैं 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

687-एक बूंद


एक बूंद 

साथ चलती रही डगर 
किनारों पर 
चुपचाप खड़े रहे शज़र 
पीछे छूटते गए मील के 
अबूझ पत्थर 
अजनबी सा लगा 
ऊँची ऊँची इमारतों से बना 
निर्दयी शहर 
अपनी ही मनमानी करता हुआ 
दूर चला गया निर्झर 
लौट कर फिर नहीं आउंगी 
कह गयी 
समय की नदी की 
अछूती सी लहर 
पत्तियों से छनकर 
आती किरणों की बूंदों से 
घिरा रहा 
मौनव्रत लिया हुआ दोपहर 
मेरे मन की घाटियों में 
गूंजते  सवालों का 
कहीं से नहीं आया प्रतिउत्तर 
झील में उतर आये चाँद के प्रतिबिम्ब को 

मिटा गया तीव्र पवन का कहर 
तिमिर के दर्द से कोई अवगत नहीं हो पाया 
रौशनी  करने के लिए 
जंगल में तन्हा  भटकता रहा एक शरर 
खामोशी के विराट सरोवर में 
तुम्हारी स्मृति की एक बूंद 
विस्तृत होकर 
बन गयी मेरी हमसफ़र 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

priy mitro

priy mitro 

namaskaar 

aap sabhi ka mere blog par svagat hain 

mai aapke blog ki rachnaaon ko ,lekho ko 

shaine shaine padhane ka vachan deta hun 

1-orkuT me kuch samay biit jaataa hain 

2-kuchh samay kavita type karne me biit jaata hain 

3-kuchh samay facebook par like karne me vytiit hota hai 

4-lekin abse aap sabhi ke blog par jaakar unhe padhane aur comments dene ko 
main pramukhta dunga 

Kishor Kumar "Khorendra "
Raipur {C.G.}

18-09-13 


686"भव्य कल्पना "

"भव्य कल्पना "

मेरे ह्रदय में हैं जो कदा 
तुम वही रहती हो सदा 

खुलती हैं जब मेरी पलकें 
हर तरफ तुम ही
मुझे नजर आती हो सहसा

मेरी नींद में भी
दबे पांव आ जाया करती हो
जैसे ही आरम्भ
हुआ करता हैं सपना

मेरे विचारों की श्रृंखला
में
बिजली सी कौंधती हो
तब मुझे भी यही हैं लगता
मैं तुम्हारे ख्यालों के संग
हो गया हूँ कहीं लापता

तुम्हारे सुसज्जित जुड़े में
रेशम की डोर सा
कसकर बंधा रहता हूँ
तुमसे दूर कहाँ रहता हूँ
अब तू ही बता

उन्मत्त लहरों सी
मुझ तट के संयम के बाँध को
तोड़ देना चाहती हों
छाई हो आकाश में मानों
सावन की घटा

तुम्हारी ख़ामोशी के जंगल में
मैं जलप्रपात सा 




निरंतर रहता हूँ गूंजता
मुझे तुम्हारी अन्तरंग ख्वाहिशों ने
लिया हैं गहराई से अपना

मेरी देह की नसों में
तुम्हारी स्मृति पिघल कर
लावे सी बहती हैं
जब भी मैं तुम्हें
याद करता हूँ यदाकदा

मेरे तसव्वुर में तुम
साक्षात प्रगट हो जाती हो
यह मेरा गुनाह हैं
तुम्हारी नहीं हैं कोई खता

मेरे इस इकतरफा प्रेम को
चाहों तो तुम
कर सकती हो मना
तुम्हारी प्रतीक्षा में
एक टूटे हुए तारे सा
इस अंतरिक्ष में फिर
रहूंगा मैं निरंतर भटकता

चांदनी सी ..तुम
आकाश से धरा पर
उतर आयी हो ...
मैं हूँ जल
जिसकी सतह पर
उभर आयी हैं
तुम्हारी दिव्य सुन्दरता

यह प्रकृति तुम्हारी देह हैं
ईश्वर हैं जिसकी आत्मा
यही हैं मेरी भव्य कल्पना
जिसे मेरे
सूक्ष्म मन ने हैं रचा

मेरे ह्रदय में हैं जो कदा
तुम वही रहती हो सदा

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 16 सितंबर 2013

685-"कतीब"

"कतीब"

तुम बिन -
अंधेरें में डूबी हुई सी 
लगती हैं महफ़िल 
तुम्हारे कदम रखते ही 
जल उठते हैं कंदील

सुरूर सा छा जाता है
और -
मैं हो जाता हूँ गाफिल

मेरी तक़दीर
में यही है कतीब
तुमसे दूर होने की
जितनी करूँ कोशिश
उतना ही पहुंचाए
मुझे
तुम्हारे करीब
तुम्हारी निगाहों में है
जो इतनी क़शिश

बस तुम्हारा ही नूर
आता हैं नज़र 


न रह जाता है तरीक
न रह जाती है मंजिल
मैं तुमसे
इतना हुआ हूँ मुतअस्सिर

तुम हुस्न का आकर्षण हो
और मैं हूँ इश्क का तहजीब
इसलिए हम दोनों हैं मुख्तलिफ़

किशोर कुमार खोरेन्द्र
{महफ़िल=सभा ,कंदील ,सुरूर=हल्का नशा ,गाफ़िल=बेहोश ,तकदीर=भाग्य ,कतीब=लिखा हुआ ,कशिश =आकर्षण ,
तरीक=रास्ता ,मुतअस्सिर=प्रभावित ,कशिश =आकर्षण ,नूर =आभा ,तहजीब =नियम ,सभ्यता ,
मुख्तलिफ़ =अलग }

684-"खुशनसीब "

"खुशनसीब "

दर्द के वृहत उपन्यास जैसे 
मेरे जीवन के 
किसी पृष्ठ पर छपी हुई 
तुम 
एक खुशगुवार कविता हो
जब भी मुझे अवसर मिलता हैं
मेरी यही ख्वाहिश होती हैं
कि
मैं तुम्हे पढ़ लूँ

जब
गर्दिश के गुबार मुझे
घेर लेते हैं
पतझड़ के वन की तरह
मैं उदास और अकेला हो जाता हूँ
अकारण ही पूरी दुनियाँ
मेरे खिलाफ हो जाती हैं

तब
अतीत के किसी सुरम्य मोड़ पर
तुमसे हुई
एक छोटी सी मुलाकात के दौरान
तुम्हारे और मेरे बीच
संकोच की लम्बी सी खामोशी को
याद कर
मैं खुद को खुशनसीब
समझने लगता हूँ

एकाएक
आसपास के द्रश्य
खुशनुमा हो जाते हैं 




मेरी स्मृति की
खूबसूरत वादियों में
स्थित वह खामोशी
मेरी चेतना में
महकने लगती हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

683-"तुम्हारी अंतरात्मा"

"तुम्हारी अंतरात्मा" 

मेरे मन की किताब का 
तुम एक कोरा पन्ना हो 
कभी उसमे तुम्हारी 
काल्पनिक तस्वीर बना लिया करता हूँ 
कभी तुम्हारे द्वारा अनलिखे शब्दों को
पढ़ लिया करता हूँ
जिसका न कोई 
शीर्षक  होता हैं
न ही जिसके हाशिये पर
तुम्हारा नाम अंकित होता हो

तुम्हारा मौन रहना ही
मेरे प्रत्येक प्रशनो का
सही उत्तर हैं
इसीलिए तो मैं
जब चाहूँ तब
तुम्हारे जवाबों को कविता के छंदों में
ढाल लिया करता हूँ
कभी लगता हैं कि
तुम मेरे अंतर्मन की अनुकृति हो

शहर के कोलाहल से दूर
नदी के दो किनारों को
जोड़ने वाले पुल की तरह
मुझे तुम अपने दुखों के साथ
नितांत अकेली नज़र आती हो
रेत पर लहरों के द्वारा
छोड़ गयी सीपियों सी
तुम्हारी मूंदी हुई पलकें
सपनों से भरी हुई लगती हैं


मंथर वेग से बहते हुए जल की खामोशी में
तुम्हारी अंतरात्मा
संध्या के सिंदूरी रंग की तरह
घुली हुई सी लगती हैं
किरणों की तरह तुम्हारा सौन्दर्य
हर तरफ बिखर जाता हैं
सागौन वृक्षों की छांवों के सदृश्य
तुम मेरे आगमन का
स्वागत करना चाहती हो 




लेकिन मैं
समय की डाल से
टूट कर गिरे हुए
एक पत्तें के समान
खुद को अनन्त काल के लिए
तुम्हारे पास छोड़ आता हूँ

फिर कभी न लौटने के लिए

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 9 सितंबर 2013

682-" उनकी दोस्ती "

" उनकी दोस्ती "

लोग ऐसे भी जाते हैं मिल 
लगता हैं 
उनके साथ रहो सदा हिलमिल 
उन्हें 

देखे बिना बीते न एक भी दिन
नया लिखने के लिए
उनकी बाते करती हैं प्रेरित
जानते हैं वे मेरे ह्रदय की पीर
अन्तरात्मा को पढ़ लेने में
वे होते हैं माहिर
ऐसे मित्र दूर रह कर भी
होते हैं दिल के करीब
ऐसे मन से मन के रिश्ते
जो होते हैं ताहिर
को -
करना नहीं होता हैं साबित
पर ऐसे लोग
कुछ ही होते हैं
जिन्हें अपनी दिनचर्या के
आवाश्यक अंग की तरह
कर लिया करते हैं
हम , शामिल 


उनकी दोस्ती
किताबों से बढ़कर होती हैं
वे खुबसूरत वादियों सा
साथ होते हैं
लगता हैं मानों
हो गहन तिमिर
और
जल उठा हो एक कंदील
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

{tahir =pavitr }

681-"मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ "


"मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ "

कभी 
दरख्तों  की बाँहों  पर 
तुम्हारा नाम लिख दिया करता हूँ 

कभी 
जिस राह से तुम गुजर चुकी होती हो 
उस राह में 
तुम्हें महसूस करने के लिए -
उड़ते  हुए  गुबार के वृत्त से 
घिर जाया करता हूँ 

कभी 
एक  कोरे कागज़ को 
तुम्हारे पास छोड़ आया करता हूँ 

कभी 
तुम्हारे मंदिर पहुँचने  से पहले 
सीढ़ियों  पर बिखरे 
कंकड़ों  को चुनकर 
हटा  दिया करता हूँ 

इस तरह 
गुस्ताखियों के जरिये 
अव्यक्त रूप से तुम्हारे समक्ष 
मैं किया करता हूँ 
अपने ह्रदय के प्रेम को जाहिर 


मेरी वफ़ा पर यकीन  करने के बदले 
तुम्हे मुझ पर क्यों 
हो गया हैं वहम आखिर 
मैं तो तुम्हारा हूँ आशिक़ 
मैं नहीं हूँ शातिर 

मैं बुझे हुए चिराग का था तारीक 
जिसने मुझे रौशन किया 
तुम वही  हो आतिश 

तुम आरिफ: हो 
मैं नहीं हूँ आरिफ़ 
तुम्हारा वास्ता ईश्वर से हैं 
मैं तुमसे हूँ वाकिफ़ 
तुम्हारे अनुपम व्यैक्तित्व  की 
इसीलिए मैं -
किया करता हूँ अक्सर तारीफ़ 

अपनी ख़ामोशी  के आकाश में 
मेरे मौन के बादलों को कर लो शामिल 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

रविवार, 8 सितंबर 2013

680-"कविता बच ही जाती है"

"कविता बच ही जाती है"

अपनी सवेंदानाओ कों 
जानने के लिये
कभी बूंद भर अमृत
कभी प्याला भर जहर 
पीना जरूरी है
मेरे लिखे हुए शब्दों कों
सुधारने के लिए
कलम की नीब की धार
काटती गयी ....
मेरी पीड़ा
कों फिर वह नींब हुबहू कहाँ .
नए शब्द दे पायी
बहुत कुछ सा हर बार ...
अनलिखा भी रह जाता हैं
भावो का एक ज्वार था ......
जिसके उतरने पर ........
मै अकेला ही था
कभी समुद्र में बिना कश्ती
और बिना पतवार के
या किनारे पर
टूटे है घरौंधों की तरह क्षत -विक्षत
मेरी मुट्ठी में
वक्त की फिसलती हुई रेत थी
और हर बार की तरह
मै वक्त के हाथों पराजित होकर
फिर शेष रह गया था
क्योंकि
कविता बच ही जाती है
और ..और .लिखने के लिये
किशोर कुमार खोरेन्द्र



शनिवार, 7 सितंबर 2013

679-धूप से सने आईने हैं हज़ार


धूप से सने आईने हैं हज़ार



मन हैं एक सितार
इच्छाएं हैं उसके तार
चाहूँ तो उन्हें मैं न छेडू
पर सभी लोग जैसे जीते हैं
अपने अपने अनुसार
वैसे ही हैं
मेरे भी मनोविकार

लगता हैं जैसे मैं
पल पल परिवर्तीत होता साया हूँ
और यहाँ तो
धूप से सने आईने हैं हज़ार




घिरा हूँ
अपने ही सुर से ,अपनी ही लय से
मेरी अपनी ही हैं ताल
मुझे लगते हैं वे मधुर
पर सब कुछ पा लेने की धुन ..
बना जाती हैं भीतर भीतर ही
कभी कभी मुझे क्रूर ,
अपने ही ईमान के  खिलाफ

आवाजों की परिधि तोड़ कर
बाहर निकलने का तरिका
मुझे नहीं हैं ज्ञात
जाता जरूर हूँ सच के क्षितिज तक
पर लौट आता हूँ हार

अपनी इन आँखों से
देख नहीं पाता हूँ उस पार
अपने कानों से सुन नही पाता हूँ
शाश्वत मौन की मीठी पुकार

जानता हूँ ..
मै न शब्द हूँ न हूँ विचार
मैं सिर्फ छोटा सा घर नहीं हूँ
रूह सा हूँ
संगमरमर के पत्थरों से निर्मित
एक गगनचुम्बी मीनार

शब्द से ,विचार से
घरसे ,परिवार से
चित्त से ,बुद्धी से ,अहंकार से ,
यहाँ तक की अपने आप से
परे हूँ ...मै एक  मौलिक इंसान

मेरे ह्रदय के प्रेम का
चाहता हूँ  करना हे अनामिका 
तुम्हारी आँखों के दर्पण में दीदार

कभी न कभी तो मिल जाएगा
मनोवांछित ..
तुमसे वह अनंत सा असीम प्यार

तुम्हें देख कर ही तो
आते हैं भाव
तुम्ही वह हो श्रृंगार
जिससे अभिभूत होने पर
मै रसमय हो जाता हूँ
अलंकृत हो जाता हूँ
और इसलिए
मुझमे आ जाया करता हँ
स्वाभविक रूप से निखार
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

678-"कवि की प्रेरणा"

"कवि  की प्रेरणा"

मुझे ....
मेरी डायरी ने
याद किया होगा

उस कोरे पन्ने ने भी 

जिस पर मै
संभवत:

एक कविता लिखा होता
अपनी बारी के इन्तजार मे
मुझे वह पन्ना कोस रहा होगा

लिखते लिखते थक चुकी पेन की नीब
अब
विश्राम  करते करते थक चुकी होगी


मेरी कुर्सी में
मेरी जगह पर किसी को न पाकर
मेरा कमरा ऊब चुका होगा

इन सबको पता नहीं की मै
अब
नहीं रहा हूँ......

खिडकी के परदे को हटाकर

देखती आशंकित  हवा सोच रही होगी -
कहीं  ..मै लौट तो नही आया

मेरी चप्पलो को

मेरे चश्मे को
मेरी कमीज को
अब तक -विशवास ही नही हुआ  है
कि
मै इस दुनियाँ  में नही हूँ 

जिस पर मैं लिखता आया हूँ  

मेरी कविताएं उसे याद करती हैं 


और
आपस में कहती हैं  -
हमसे बिछड़ चुके 
कवि के लिए
हमारी यही सच्ची श्रद्धांजलि  होगी
हमेशा के लिए
की हम कवि  की प्रेरणा को न भूले
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

677-"अमानत "

"अमानत "

तुम कल्पना हो या सच 
तुम्हारे प्रति आये 
पवित्र ख्यालों से 
मेरा मन हो जाता हैं 
निरमल और स्वक्छ

तुम्हें रोज लिखता हूँ
प्यार के ख़त
अज्ञात हैं
तुम्हारा नाम और पता
इसलिए वे मेरी डायरी के
बन कर रह गए हैं अमानत 





तसव्वुर में तुम्हे
सोच लिया करता हूँ
सपनों में मिलने आती हो
तुम मुझसे प्रत्यक्ष

बोले बिना चल देती हो
पर तुम वापस
इसलिए
अनअभिव्यक्त सा रह गया हैं
मेरा प्रेम तुम्हारे समक्ष

जानता हूँ
तरसता रहूँगा आजीवन
निहार पाने को
तुम्हारी एक झलक

किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

676-"तुम और पाक हो जाओगी"

"तुम और पाक हो जाओगी"

मेरा ह्रदय
मौन का घर हैं
ख़ामोशी की ईटों से
बनी हैं इसकी दीवार

मेरी तन्हाई रहती हैं यहाँ
जिसका तुम्हारे सिवाय
किसी और से
नहीं हैं सरोकार

तुम और पाक हो जाओगी
इसमे
रहने के दौरान
तुम्हारी याद में
मेरे तसव्वुर ने किया हैं
इस मकान का निर्माण


तुम्हारा दिल
मेरे दिल में मिल जायेगा
कहाँ रख पाओगी उसे
खुद तक ही बरकरार


यहाँ की खिड़कियाँ ,परदे ..
सभी हैं पारदर्शी
देख सकती हो तुम
मुझे ...आर पार



तुम्हारी रूह का ..
मेरी रूह कों हैं
बस इंतज़ार

तुम्हारे प्यार की उँगलियों का
पाते ही स्पर्श
मिल जाएगा मुझे निर्वाण

kishor kumar khorendra 

बुधवार, 4 सितंबर 2013

675-"तुम्हारे और मेरे दरमियान "

"तुम्हारे और मेरे दरमियान "

यूँ तो 
तुम्हारे और मेरे दरमियान 
बहुत है 
फर्क
तुम सब्ज : जमीं हो
बादलों से घिरा
मैं हूँ फ़लक
मेरे मन के आँगन में
खिल आये गुलमोहर सी 


मुझे तुम लगती हो
जबसे देखा हूँ मैं
तुम्हारी एक झलक
सूना नहीं लगता
अपरिचित इमारतों का यह शहर
न उदास सी लगती है
इंतज़ार की तरह लम्बी यह सड़क
जब से तुम्हारी निगाहों के इशारों ने
समझाया है
मुझे इश्क का मतलब
तुम्हारा ही हुस्न
नज़र आता है मुझे हर तरफ
मेरी सांसों में घुली हुई है
तुम्हारे चन्दन से बदन की महक
मेरी तकदीर गयी है बदल
लिखने लगा हूँ तुम पर ग़ज़ल
चहकने लगी हैं कलम
इजहारे इश्क के लिए
बेताब हो उठे हैं हरफ़
दो अजनबी
उल्फ़त में कही जाए न बहक
मैं उड़ता हुआ हूँ एक विहग
तुम्हारी बांहों का घेरा है
मेरे लिए सुरक्षित सा कफ़स
यूँ तो
तुम्हारे और मेरे दरमियान
बहुत हैं 
फ़र्क

तुम सब्ज : जमीं हो
बादलों से घिरा
मैं हूँ फ़लक

किशोर कुमार खोरेन्द्र

रविवार, 1 सितंबर 2013

674-"एक और जीवन "

"एक और जीवन "

तुम्हारे अकेलेपन के आकाश में 
अक्षर ,सितारों की तरह जगमगाते होंगे 
तुम्हारे अकेलेपन के वन में 
शब्द के बीज अंकुरित होकर
चन्दन का वृक्ष बन महकते होंगे
तुम्हारे अकेलेपन के आँगन में
गमलों में
सपने गुलाब सा खिलते होंगे
तुम्हारे अकेलेपन के घर में
न दरवाजा ,न खिड़कियाँ न दीवारे होंगी
तुम्हारे अकेलेपन के आईने में 




तुम्हारी हमशक्ल एक युवती
की छवि सुरक्षित होगी
जिसके ख्याल
तुमसे पूरी तरह से मिलते होंगे
वह कहती होगी .
लौट आओ
फिर से इसी जन्म में
एक और जीवन
अपनी इच्छानुसार जीने के लिए
तुम्हारे अकेलेपन की ख़ामोशी
चांदनी के धागों से बुनी हुई
बहुत मुलायम होगी

किशोर कुमार खोरेन्द्र