शनिवार, 24 अगस्त 2013

668-"जीवन का अर्थ "

"जीवन का अर्थ "

मुझे लगा कि -
आज का दिन भी
सार्थक नहीं हो पाया
तब -
पूरे दिन ने मुझसे कहा -
व्यक्तिगत कामनाओं का अंत नहीं हैं
बल्कि तुम्हें-
जंगल के एकांत के साथ खो जाना था
नदी के संग बह जाना था
प्लेटफार्म पर ठहरना नही
पटरियों सा दूर कही चले जाना था
फुटपाथ पर पड़ी
एक् पुरानी पत्रिका
मे छपी किसी अनाम कवि की
उस जानदार कविता कों पढ़ लेना था

दूरियों से पूछकर
तुम क्यों जानना चाहते हो
जन्म और मृत्यु के बीच
अपने जीवन का कितना है फासला

लोग अकारण ...
झूठ नही बोलते
दुःख और अपमान नही सहते
प्लेट धोते हुवे बच्चे की उंगलिया
यूँ ही सफ़ेद नही हो जाती होगी
कोई किसी कों चाहने
ऐसे ही नही लग जाता होगा

प्रतिदिन टहनियों पर फूल
यूँ ही नहीं खिल जाते
निरर्थक लगने का मतलब ही हैं
जीवन का कोई अर्थ अवश्य है

किशोर कुमार खोरेन्द्र


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