गुरुवार, 22 अगस्त 2013

666-"उड़ते हुए गुबार सा"

"उड़ते हुए गुबार सा"
मैं हूँ मुसाफिर 
परछाईयों से 
हुआ हूँ मुतस्सिर 

तुम्हारी तस्वीर से
मोहब्बत करता हूँ
यही हैं मेरी तकदीर

तुम्हारी निगाहों में
हैं कशिश
भूल जाया करता हूँ
इसलिए मैं तहजीब

तुम्हारे तारीफ़ में
जो लिखी गयी हैं
मैं हूँ वही तहरीर 




तुम ही हो मंजिल
तुम ही हो तरीक
उड़ते हुए गुबार सा
मैं हूँ अनाम एक पथिक
अपने कारवाँ में
मुझे भी कर लो शरीक

किशोर कुमार खोरेन्द्र
{तरीक =रास्ता ,मुतस्सिर =प्रभावित ,तहजीब =सभ्यता ,
,तहरीर =हस्तलिपि ,गुबार =धूल ,कारवाँ =यात्री दल }

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