सोमवार, 19 अगस्त 2013

663-"मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला "

"मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला "


मेरे पांव जमीं पर टिकते नहीं हैं 
तुम्हारी याद हैं सावन का झूला 
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


मेरी कविताओं को पढ़कर 

तुम्हारे दवारा
मेरी प्रशंसा के पुल बांधना
और मेरा मन ही मन फूला नहीं समाना
जिसकी प्रेरणा से मैं सृजन कर पाया हूँ
वह तुम ही हो
और नहीं हैं कोई दूजा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


तुम हो मेरे रहनुमा
तुम्हारे स्नेह की उँगलियों ने
जबसे मुझे हैं छुवा
बहारों सा लगता हैं
हर मौसम मुझे खुशनुमा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


मैं रेत कणों की तरह
अक्षर अक्षर था बिखरा हुआ
तुमने मांगी थी मेरे लिए दुआ
तभी तो मैं ढाई आखर से बने
एक शब्द की तरह हूँ जुड़ा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


अब नहीं हूँ मैं तनहा
न यह जग लगता हैं मुझे सूना
मेरे ख्यालों के उपवन में
तुम मिल ही जाती हो
जब भी मैंने तुम्हे ढूढा
तुमसे मिलकर मेरे ख़्वाब हुए सारे पूरे
मैं नहीं रहा अब अधूरा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


तुम्हारा प्यार मेरी साँसों में हैं घुला
मेरे ह्रदय में बसी तुम्हारी सुन्दर छवि की
मैं रोज करता हूँ
काव्य -सुमनों से पूजा
मानो संग हो वो खुदा
मेरे पांव जमीं पर टिकते नहीं हैं
तुम्हारी याद हैं सावन का झूला
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


किशोर कुमार खोरेन्द्र 

{रहनुमा =पथ प्रदर्शक ,रहबर 
खुशनुमा=मनोरम }

2 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u sushama varmaa ji .......
isi tarah hausala badhaati rahe