शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

662-"अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब "

"अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब "

पीले पुष्पों की हुई है बरसात 
घना हैं कोहरे का बाहुपाश 
दूबों के सर के 
ओस कण बने हैं ताज 
ओझल हुए से लग रहे हैं
वृक्षों के उलझे हुए शाख

खेतों के जल के दर्पण में
धीरे धीरे परछाईयाँ
ले रही हैं आकार
धरती पर जैसे उतर
आया हो सिंदूरी आकाश
सोच रही हैं वसुंधरा
कोई तो होगा
दिवस अवसान तक अब साथ

बिखरी हैं पीत वर्णीय धराशायी पंखुरियाँ
मानों हो वे रंगोली के कतार
काले मेघों के जमघट को कर पार
बड़ी कठिनाई से
पहुँच पाया हैं
भोर का यह धुन्धला प्रकाश

शुरू हो गया हैं कलरव
रंभाने लगी हैं गाय
गगन की दिशाए हैं अनजान
उड़ कर जाने लगे हैं नभ में
फिर भी
बगुलें अपने पंख पसार

एकाएक बरस पड़ी हैं सावन की बौछार
प्रचंड वेग से बहने लगी हैं
नदियाँ की उल्लसित धार
तार पर बैठी नन्ही चिड़ियाँ
विचार मग्न हैं
कहाँ से लाऊंगी आज
बच्चों के लिए आहार 



भींगे भींगे से इस मौसम में
मुझसे मेरा मन कहता हैं
न किया करो मित्र
इस जीवन में
किसी उत्तर की तलाश
ये दुनियाँ हैं एक
अनुत्तरित सवाल

प्रकृति का यह
अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब
तटस्थ हो कर
इसे करना हैं बस आत्मसात

किशोर कुमार खोरेन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

प्रकृति की अनुपम छटा समेटे लाजवाब पोस्ट |

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

imran ansaari ji shukriya bahut