गुरुवार, 15 अगस्त 2013

661-"मेरी कोरी कल्पना"

"मेरी कोरी कल्पना" 

तुम्हारे खूबसूरत व्यैक्तित्व का 
मैं हूँ दीवाना 
तुम शमा हो मैं हूँ परवाना 


कभी छत पर आने के लिए 
कपड़ों को सुखाने का करती हो तुम बहाना 
कभी चोरी से नज़रें मिलाकर  चल देती हो 
तब अच्छा लगता तुम्हारा शरमाना 

मेरे किसी ख़त का 
तुमने जवाब नहीं दिया हैं मौन रहकर सीखा  हैं 
तुम्हारे लबों ने बस मुस्कुराना 

बस दूर से देखता रहा हूँ तुम्हे 
मेरे सपनों में ,मेरे ख्यालों में भी 
तुमने छोड़ दिया हैं आना 

यह मेरा एक तरफा प्रेम हैं 
बदले में मेरी  नहीं हैं कोई कामना 
मुझे लगता हैं 
कभी तुम हकीकत हो 
कभी हो  मेरी कोरी कल्पना 
तनहा ही रह जाउंगा आजीवन 
असंभव हैं तुम्हे पाना 

तुम्हारे खूबसूरत व्यैक्तित्व का 
मैं हूँ दीवाना 
तुम शमा हो मैं हूँ परवाना 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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