मंगलवार, 13 अगस्त 2013

658-असीम और अपरमीत"

असीम और अपरमीत"

जल कहता हैं

मुझे मत छूना

सिहर कर मैं जाउंगा हिल

परछाई कहती

मत करना मेरा स्पर्श

भावावेश में हो उत्तेजित

मैं जाउंगी मिट



लगता हैं मैं हूँ मानों -

मनुज ..एक सीप

जो अपने सीने में -

पंखुरियों के सदृश्य

ह्रदय की भावनाओं से निर्मित

कल्पनाओं के रंगीन मोती कों -छिपाए हुए

रह जाता हैं -आखिर तक गरीब

मेरी कल्पना तुम नहीं हो कमीज

की -

जिसे मैं उतार कर

खूंटी पर टांग कर -कर जाऊ विस्मृत

तुमने तो मेरे -तन ,मन ,और आत्मा तक कों

रंगीन चूनरी सा ओढ़ रखा हैं

हे मेरी कल्पनातीत

इसलिए चाहता हूँ मैं -

कभी तुम जाओ मुझे

इस स्वप्न रूपी जग में

साकार रूप में मिल

लेकिन तुम कहती हों -मुझसे ...

मैं आईने के भीतर हूँ समाहित

मुझे बिम्ब समझो या ...

प्रतिबिम्ब

मतलब एक ही हैं -

ध्यान -मग्न यदी ..विचारोगे

होकर तल्लीन

मेरी सुन्दरता हैं ...

अनुपम और रमणीक

जिस दर्पण से मैं होती हूँ -परावर्तीत

वह दर्पण भी हैं

असीम और अपरमीत

इसलिए हे कवि -

मैं कल्पना हूँ

चिर यौवना और शून्य में --कोहेरे सी विलीन

मैं स्वप्ना सी तुम्हें होते रहती हूँ

जागरण हो या नींद -

दोनों ही अवस्थाओं में आभासित

इसलिए मुझे चाहोगे

अपने बाहूपाश में यदि जकड़ना

तो

चूर चूर हो जायेंगा उसी क्षण

दर्पण का भी अस्तित्व

फिर कैसे छू पाओगे

कल्पना में ...सौन्दर्य के उतुंग शिखर कों

हे कवि .......!

सृजनशील

इसीलिए मैं तुम्हे लगती हूँ

कभी आकाश की तरह दूर

कभी धड़कते ह्रदय के समान अति समीप

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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