सोमवार, 12 अगस्त 2013

655-"जबसे आया सावन "

"जबसे आया सावन "

अम्बर पर छाये काले बादल 
धरती का भींगा आँचल 
हरा भरा हुआ कानन 
जबसे आया सावन 
महानगर से लौट आया पूरा गाँव
करने सुमधूर लोक गीतों का गायन
जिन्होंने किया था
पिछले बरस पलायन
कतारों मे ऊगने लगी हैं नयी उम्मीदें
खेत हुए फिर मन भावन
मिलने आयेंगे साजन
यह सोचकर
सरक रहा खुद ब खुद दामन
जिसे जानते नहीं ,पहचानते नहीं
धुंधली सी वह सूरत
याद आने लगी हैं अचानक
नयन बन गए मदभरे सागर
पीकर मदहोश हो गया सा
लगता हैं सारा आलम
महुआ के घने वृक्ष तले
ठहरी सी लगती हैं सहमी सहमी सी
नीरवता की नज़ाकत
मानों सीख रही हो
मन ही मन प्रेम का उच्चारण
मेरी पीठ पर लिख दो
कहता हैं कोरा काग़ज
एक सरस प्रेम गीत अकारण
अम्बर पर छाये काले बादल
धरती का भींगा आँचल
हरा भरा हुआ कानन
जबसे आया सावन

किशोर कुमार खोरेन्द्र


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