रविवार, 11 अगस्त 2013

654"तुम मुझे चाहती हो"

"तुम मुझे  चाहती हो"

एक नदी
की
कल्पना मे -
सिक्को की जगह - छोर में
जीने लायक यादगार पलो को
बाँध कर रखे -मेरे रुमाल को
तुमने -थामा नही
पानी मे बह जाने दिया
एक पहाड़ के स्वप्न में
चोटी पर पहुँच  चूका था मैं
वापस लौटने के लिए
एक पगडण्डी  को मेरे साथ
आने  से तुमने मना  कर दिया
एक जंगल के चिंतन मे
तुमने मुझे
पेडो की छाँह   से वंचित रखा
सपनो मे भी
कल्पनाओं  में  भी
मनन में भी
तुम कभी -नदी को प्यार की
छीटों  की तरह -मुझ पर उड़ेलती  रही
मै तुमसे दूर न चला जाऊं
इसलिए -पहाडो को भी
मेरी  राह मे -
रोडे  की तरह अटकाती रही
जंगल के गहरे मौन से
कभी -कभी मुझे डराती रही
सताते उसी को है
जिससे प्यार अधिक होता है
तो मै जान लूँ  की
तुम मुझे  चाहती हो
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

4 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुती......

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

shukriya sushmaa

इमरान अंसारी ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया । गहन, सुन्दर , शानदार |

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

imraan ansaari ji shukriyaa