रविवार, 11 अगस्त 2013

653-"दिवस हो जाता हैं और उज्जवल"

"दिवस हो जाता हैं और उज्जवल" 

खुलती हैं जब 
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक 
रात सुबह मे जाती हैं बदल 
चिड़ियों की चहक 
सुनायी देती हैं दूर तलक 
खिल आते हैं सरोवर मे कमल 
क्षितिज की सीमा को 
लांघ आती हैं सुनहरी किरणे दमक 
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक
लेती हो जब तुम अंगडाई
नदियों की लहरे जाती हैं मचल
खेतों मे लहलहाने लगती हैं
ऊगी हुई नयी फसल
प्यासी जड़ों को सींचने के लिए
खुद ब खुद दौड़ पड़ती हैं धारायें
करती हुई कलकल
पत्तों की नोक पर अटकी हुई सावन की
अंतिम बूंद जाती हैं टपक
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक

निहारती हो जब
अपना खूबसूरत चेहरा सुकोमल
झरने लगता हैं पीपल
किनारों पर उछलकर
तुम्हारे सौन्दर्य को निहारने के लिए
मौजें करने लगती हैं पहल
छिड़कती हो जब
अपने महरुख पर जल शीतल
गीली धूप की बूंदों से
भींग जाता हैं हरा भरा जंगल
खिड़की से झांकती हैं
बाहर जब तुम्हारी नज़र
मोंगरे की फूलों की तरह तब
दिवस हो जाता हैं और उज्जवल
घुमड़ आये काले बादलों को हटाकर
तुम्हे देखने लगता हैं
एकटक.... फ़लक
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक

किशोर कुमार खोरेन्द्र



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