सोमवार, 5 अगस्त 2013

652-"मेरी चेतना की शमा"

"मेरी चेतना की शमा"

अब न मेरा नाम हैं न मेरा पता 
मैं हो गया हूँ लापता 

अज़ल से हूँ मैं एक रवाँ 
खुद को खोज रहा हूँ
न मेरा कोई शहर हैं न कदा

भीतर उजाला हैं
बाहर हैं अन्धेरा घना

हर तरफ खामोशी हैं
शज़र के सायों से भी
कुछ कहना यहाँ हैं मना

दुःख की अनेक कहानियों सी हैं जिंदगी
करुणा से मेरा ह्रदय हैं भरा

मेरी पूरी कोशिश रहती हैं
कोई यह न जान पाए की -
मैं कितना सहमा सा हूँ
और कितना डरा

एक दिन -
मेरा मन धुँवा बनकर उड़ जाएगा
मेरी देह हो जायेगी फ़ना

पर इसी तरह
प्रज्वलित रहेगी मेरी चेतना की शमा
जब तक घूमती रहेगी यह धरा

किशोर कुमार खोरेन्द्र