सोमवार, 5 अगस्त 2013

651-'चन्दन सी तुम्हारी महक"

'चन्दन सी तुम्हारी महक" 

कभी दर्पण में ,कभी जल में 
तुम्हारी छवि उभर आई 
तुम हो सिर्फ एक परछाई 
मन के कोरे कागज़ पर 
तुम्हारी तस्वीर मैंने बनायी
तुम हो सिर्फ परछाई
बिना अक्षरों के तुम्हे पढ़ लेता हूँ
बिना स्वरों के तुम्हे सुन लेता हूँ
ख़ामोशी की ऐसी हो तुम शहनाई
तुम अज्ञात हो, तुम अद्रश्य हो
फिर भी
तुम्हारे होने के अहसास के मीठे जल से
लबालब भरी होती हैं
किसी झील सी मेरी सूनी तन्हाई
तुम हो सिर्फ परछाई
हालाँ की तुम हो केवल कल्पना
इस दुनियाँ रूपी सपने मे
तुम्हारी याद के संग
लगे अच्छा मुझे भटकना
जीवन की राह की कोई मंजिल हैं या नहीं
मालूम नहीं
लेकिन चन्दन सी तुम्हारी महक
सांसों मे हैं मेरे भरआई
तुम हो सिर्फ एक परछाई
किशोर कुमार खोरेन्द्र



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