शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

650-"तुम हो मेरा जमीर "

"तुम हो मेरा जमीर "

हालांकि तुम अक्षरों से ,शब्दों से 
परे हो 
फिर भी मेरे मन के पन्नों में अंकित 
खामोशी का अंजुम हो तुम अमिट 
तुम हो मेरा जमीर 
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर 
तुम ही हो मेरी मंजिल 
तुम्हारे बिना 
मैं हूँ केवल आवारा सा एक तरीक
जहां जहां
तुम्हारे अनुपम हुश्न की सुहावनी धूप हैं
वहां वहां…
परछाईयों सा होता हूँ
मैं तुम्हारे संग शरीक
तुम्हारी बोलती सी निगाहों मे
हैं ऐसी कशिश
की हो गया हूँ मैं तुम्हारा मुरीद
तुम्हारी नर्म उड़ती हुई जुल्फें
तबस्सुम बिखेरते हुए तुम्हारे लब
मुझसे कह रहे हैं मानो
लहरों की तरह जबरदस्ती
आ जाओ हमारे करीब
नहीं हैं कोई बंदिश
पर मेरे मन मे हैं
कशमकश अजीब
बेपनाह मोहब्बत यदि तुम मुझसे करती हो
तो मेरे ह्रदय में भी है
तुम्हारे खातिर प्रेम असीम
मेरे ख़्वाबों की तरह
तुम्हारे ख़्वाब भी
क्या होते हैं उतने ही हसीन
मेरे ख्यालों के आकाश मे
तुम्हारे अनकहे मूक शब्दों के अनंत तारे
जगमगाते हैं
इसलिए मैं हूँ खुशनसीब
तुम्हारा सौन्दर्य हैं फरीद
निहार कर उसे
मैं रह गया हूँ इस जहां में चकित
खुदबखुद हो जाती हैं
कविताएं सृजित
नहीं हैं ये तस्नीफ़
यदि तुम हमीदा हो
तो मैं हूँ हमीद
पर तुम्हारे और मेरे बीच
अपारदर्शी कोहरे की दीवार की तरह
उठी हुई है
हमारी अपनी अपनी तहजीब
तुम हो मेरा जमीर
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर
किशोर कुमार खोरेन्द्र

{१-जमीर =आत्मा ,मन २-तरीक =रास्ता ,३-मुरीद =अनुयायी ,४-तबस्सुम =मुस्कराहट ,५-फरीद =अनुपम ,६-तस्नीफ़ =बनायी हुई कविता ,७-तहजीब =सु संस्कार ,८-हमीदा =साध्वी ,९-हमीद =सदाचारी १०-अंजुम =नज्म का बहुवचन }