गुरुवार, 29 अगस्त 2013

673-"आंतरिक दृष्टि"

"आंतरिक दृष्टि"

जैसा मैं बाहर से दिखाई देता हूँ 
वह तो इस संसार के रंगमंच पर 
मेरा हैं अभिनय 

मेरे वास्तविक स्वरूप से
मेरा-
खुद से नहीं हुआ हैं
अब तक शायद परिचय

बाहर और भीतर से
एक समान व्यवहार वाले
होते हैं -
इस जग में लोग कतिपय

तुम्हारे द्वारा-
मुझ पर कहानी लिखने से पहले
क्यों न कर ले -
अपने अपने विचारों का
आपस में विनिमय 



तभी तो तुम
गढ़ पाओगी वह पात्र
जिसमे -
मेरा चरित्र हो पायेगा विलय

पर हो सकता हैं बाद में
कहानी पूरी पढ़ने के पश्चात
मैं वैसा ही बन जाऊं
जिस तरह से तुमने
अपनी कल्पना में
मुझे साकार करने का
किया हैं दृढ़ निश्चय

मुझे तुम पर पूरा भरोसा हैं
तुम्हारी कहानी के अनुरूप मैं
पिघल कर ढलता जाउंगा
तुमसे मेरा यही
निवेदन हैं सविनय

अभी तो केवल मैं तुम्हारा
कहानीकार के रूप में
एक प्रशंसक हूँ
कहानी के खत्म होते होते
कही आरंभ न हो जाए
तुम्हारे प्रति मेरी और से
गहरी मित्रता अतिशय

तुमने चुना हैं मुझे
अपनी कहानी का नायक
सोच रहा हूँ
क्या मैं हूँ इस लायक
मेरे ख्याल से इस समय
उचित ही हो
तुम्हारी -
आंतरिक दृष्टि
और चेतना की
अंतिम सतह से
लिया गया यह निरणय

किशोर कुमार खोरेन्द्र

672-"तुम्हारे बारे में विचार"

"तुम्हारे बारे में विचार" 

तुम केंद्र बिंदु  हो 
मैं हूँ हिसार 

मैं एक कोरा  पन्ना  हूँ 
तुम हो पूरी किताब 

तुम नींव हो 
मैं हूँ दीवार 

मैं तीरगी हूँ 
तुम हो चिराग 

तुम मंदिर का स्वर्ण कलश हो 
मैं हूँ जर्जर  मीनार 

मैं रिवाज हूँ 
तुम हो उसके खिलाफ 

तुम पाक रूह हो 
मैं हूँ मलीन लिबास 

मुझमे बाकी हैं अब तक विकार 
अपने मन पर है तुम्हारा 
सम्पूर्ण अधिकार 

तुम सोच से परे हो 
मैं किया करता हूँ 
फिर भी 
तुम्हारे बारे में विचार 

तुम हिजाब हो 
रहता हैं फिर भी 
मुझे तुम्हारा  इंतिजार 

मैं  किया करता हूँ  
तुम्हारी इबादत 
तुम हो 
खूबसूरत निगार 


मैं कभी कभी 
तुम्हारी परवाह नहीं करता हूँ 
तब भी तुम 
मुझ पर हो निसार 

तुम केंद्र बिंदु  हो 
मैं हूँ हिसार 


किशोर कुमार खोरेन्द्र 

{हिसार =परिधि ,तीरगी =अंधकार ,रिवाज =परंपरा ,हिजाब =संकोच,  निगार =प्रतिमा निसार =न्योछावर ,}

बुधवार, 28 अगस्त 2013

671-"मेरे काव्य का चरित्र "

"मेरे काव्य का चरित्र "

स्मृति के पन्नों पर 
जब मैं पढ़ता हूँ अपना अतीत 
एक सपने की तरह वह 
होता हैं मुझे प्रतीत 

कभी वन के ,कभी उपवन के
कभी नदी के ,कभी परवत के
कभी सागर के ,कभी उद्गम के
कभी मरुथल के ,कभी निरझर के

 जाने लगा हूँ मैं अब करीब
गौर से मनुष्यों को भी देखने लगा हूँ
जान पाया हूँ तब-
इस जग से कितना था
मैं अब तक अपरिचित
हर किसी के पास
अपनी अपनी हैं तकलीफ
अपने अपने स्वभाव में उलझा हुआ लगा
प्रत्येक व्यक्ति मुझे अधिक

प्रकृति में ऐसी है कशिश
मनोरम दृश्यों को निहार कर
हो गया हूँ मैं
उनके प्रति आकर्षित
मेरा मन आप ही आप
रचने लगा हैं गीत
मुझे जब नज़र आने लगी
निस्तब्धता की काल्पनिक छवि
तब मैं बन गया कवि
पहाड़ से उतर कर
नदी की तरह तुम मुझे
आती सी 
लगती  हो
मुझ तक ,मेरे समीप 



सृजन के क्षणों में
यही सोचता हूँ कि -
संयमित और अनुशासित रहे
मेरे काव्य का चरित्र

मानों आईने के भीतर
सब कुछ हो रहा हो घटित
और लगता हैं -
मैं उसे विस्मय से
तस्वीरों की तरह
अवलोकन कर रहा हूँ
होकर आश्चर्यचकित
अपने ह्रदय के प्रेम को

किसे  करूँ मैं अब अर्पित
नींद नहीं आती हैं तब
तारों से कर लिया करता हूँ बातचीत
दिन के उजाले में….
मौन के निरूत्तर सायों की भीड़ में
हो जाया करता हूँ शरीक

मैं ही सर्जक ,
मैं अपनी ही
कविताओं का हूँ काव्य रसिक
ऐसा हूँ मैं एक अदीब
मेरे वैरागी जीवन का.
एकाकीपन ही हैं प्रतीक
स्मृति के पन्नों पर
जब मैं पढ़ता हूँ अपना अतीत
एक सपने की तरह वह
होता हैं मुझे प्रतीत

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

670-"नूतन गीत "

"नूतन गीत "

तुम्हारे रखते ही कदम 
उपवन की उदास कलियाँ गयी खिल 
पत्तियों की नोकों पर 
अटकी हुई बूंदें गयी गिर 

बड़ने लगा नदी का जल स्तर
प्यासे खेतों की माटी तक पहुँचा नीर 

निशाने पर लगा 
तुम्हारी नज़रों का तीर 


मेरे मन आकाश में
ऊग आया इन्द्रधनुष
मेरे ह्रदय के गमले में
प्रेम का सुप्त बीज हुआ अंकुरित 

मेघ  बनकर मैं बरसने लगा 
भादों सा रिमझीम 
सोंधी सोंधी महक छोड़ गयी तुम 
 मेरी साँसों में हो गयी विलीन 

तलाशता रहा तुम्हे
पर तुम तो हो आकृति विहीन 
फिर भी तुम्हे याद करता हूँ 
वियोग ही है प्रीत
मेरे स्पंदन की लय  पर 
गूँज उठा स्नेह का नूतन गीत 

किशोर कुमार खोरेन्द्र

शनिवार, 24 अगस्त 2013

669-वह खामोश थी

वह खामोश थी

हालांकि -उसे मालूम था सामने बैठा हुआ  शख्स उससे बहुत प्रभावित हैं

वह उसके चित्र बनाता हैं और उसके हर भाव पर काव्य रचता हैं

बहुत देर बाद उसने मुझसे कहा -

"हमसे बड़ी हमारी कवितायें हैं हमारी पेंटिंग्स हैं"

मैंने महसूस किया कि -वह ठीक कह रही हैं

इस शांत और संयमित मुलाक़ात के बाद

मैं उसे अभिवादन कर बाहर आ गया

मुझे अब धूप में चमक कम लग रही थी

सूरज नदी से बहुत ऊँचाई पर था

फिर भी गमलो में खिले फूलों के रंग कुछ फीके लग रहें थे


ऐसे वह पास ही खडी थी मुझे आज के अंतिम नमस्कार के लिये

तभी मुझे याद आया ......

मैं उससे उसकी कविता नहीं सुन पाया हूँ

न ही वह लोरी जिसे मैं मन ही मन रोज रात सोने से पहले सुनता हूँ

और न ही मैं उसके आँचल के छोर से पानी से तर अपने ओंठो कों पोंछ पाया हूँ


शायद इस जन्म में मिला -उसके प्रेम के स्पर्श का एक शुभ अवसर ....

मेरे हाथ से फिसल चुका था

मैंने देखा फर्श पर बिखरे कांच के काल्पनिक टुकडो में हमारी आत्माए

हमारे इस संकोच पर एक साथ खड़ी  हुई  मुस्कुरा रही थी


किशोर कुमार खोरेन्द्र 


668-"जीवन का अर्थ "

"जीवन का अर्थ "

मुझे लगा कि -
आज का दिन भी
सार्थक नहीं हो पाया
तब -
पूरे दिन ने मुझसे कहा -
व्यक्तिगत कामनाओं का अंत नहीं हैं
बल्कि तुम्हें-
जंगल के एकांत के साथ खो जाना था
नदी के संग बह जाना था
प्लेटफार्म पर ठहरना नही
पटरियों सा दूर कही चले जाना था
फुटपाथ पर पड़ी
एक् पुरानी पत्रिका
मे छपी किसी अनाम कवि की
उस जानदार कविता कों पढ़ लेना था

दूरियों से पूछकर
तुम क्यों जानना चाहते हो
जन्म और मृत्यु के बीच
अपने जीवन का कितना है फासला

लोग अकारण ...
झूठ नही बोलते
दुःख और अपमान नही सहते
प्लेट धोते हुवे बच्चे की उंगलिया
यूँ ही सफ़ेद नही हो जाती होगी
कोई किसी कों चाहने
ऐसे ही नही लग जाता होगा

प्रतिदिन टहनियों पर फूल
यूँ ही नहीं खिल जाते
निरर्थक लगने का मतलब ही हैं
जीवन का कोई अर्थ अवश्य है

किशोर कुमार खोरेन्द्र


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

667-पुल से तुम्हारे घर तक

पुल से तुम्हारे घर तक
पहुंची ..सड़क पर मैं 
कभी नही चला हूँ 
पुल तक आकर ...
लौटते हुए  मै ...
तुम्हें देखे बिना ....ही ...यह मान लिया करता हू
कि -
मैंने तुम्हें देख लिया है

मुझे लेकिन हर बार -
यही लगता है की -
बंद खिडकियों के पीछे ...
खड़ी  हुई  तुम -
हर प्रात:
हर शाम
उगते और डूबते हुए  .....सूरज की तरह ..मुझे
जरूर देखती रही हो

सड़क के किनारे खड़े वृक्ष भी
अब
मुझे पहचानने लगे है
पत्तियाँ  मेरे मन की किताब मे लिखी जा रही
कविताओ कों पढ़ ही लेती है

पुल पर बिछी सड़क कों
मेरी सादगी और भोलेपन से प्यार हो गया है
मेरे घर की मेज पर -जलता हुआ  लैम्प
मुझसे पूछता है ..
क्या तुम्हारी कविता कभी समाप्त नही होगी ...?

मेरा चश्मा ...मेरी आँखों मे भर आये आंसूओ कों
छूना चाहता है
पर उसके पास भी हाथ नही है
काश तुम्हारी आँखों की रोशनी के हाथ लम्बे होते
और तुम मुझे छू पाती ......

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

666-"उड़ते हुए गुबार सा"

"उड़ते हुए गुबार सा"
मैं हूँ मुसाफिर 
परछाईयों से 
हुआ हूँ मुतस्सिर 

तुम्हारी तस्वीर से
मोहब्बत करता हूँ
यही हैं मेरी तकदीर

तुम्हारी निगाहों में
हैं कशिश
भूल जाया करता हूँ
इसलिए मैं तहजीब

तुम्हारे तारीफ़ में
जो लिखी गयी हैं
मैं हूँ वही तहरीर 




तुम ही हो मंजिल
तुम ही हो तरीक
उड़ते हुए गुबार सा
मैं हूँ अनाम एक पथिक
अपने कारवाँ में
मुझे भी कर लो शरीक

किशोर कुमार खोरेन्द्र
{तरीक =रास्ता ,मुतस्सिर =प्रभावित ,तहजीब =सभ्यता ,
,तहरीर =हस्तलिपि ,गुबार =धूल ,कारवाँ =यात्री दल }

665-"मैं अभिशप्त हूँ"

"मैं अभिशप्त हूँ"

मैंने उससे पूछा

तुम्हारे जीवन में नहीं ,लेकिन

क्या तुम्हारे सपनो में

आ सकता हूँ

उसने कहा -नहीं


तुम्हारे घर के दरवाजे मेरे लिये बंद हैं

मगर क्या मैं

रेल की तरह

तुम्हारे शहर से गुजर सकता हूँ

उसने कहा -नहीं


मेरे नाम और मेरे पते ने कहा -

हम भूलना चाहते हैं

इस शख्स कों ......

क्या अनुमति आपसे मिल जायेगी

उसने कहा -नहीं


यहीं तो इसकी सजा हैं

इसे न खुद कों भूलना हैं ..न ..मुझे

क्योकि -

इसने मुझसे प्यार करने का अपराध

मेरी सहमती के बगैर किया हैं


फिर मैं उसे भूलने के लिये

कभी -समुद्र के किनारे गर्म रेत पर

एक बूंद की तरह लेट गया

कभी -मेरा शरीर काँटों सा बिछ गया

कभी -मेरे पाँव अंगारों कों पार कर आये

कभी -फुटपाथ पर बिखरे खाली दोनों सा

भूखा रह गया

कभी -मृत देह कों ले जाती भीड़ में शामिल हो

चिता तक चला गया.............


अंत में मुझे थका हुआ और पराजित जानकर

सीढियों ने मन्दिर के करीब बिठा लिया

और तब -

बजती हुई घंटियों ने मुझसे पूछा -

आखिर तुम्हें हुआ क्या हैं

मैंने कहा -मैं जिसे भूलना चाहता हूँ

वही मुझे ज्यादा याद आ रही हैं

मैं अभिशप्त हूँ

चबूतरे की सारी प्रतिमाओं की आँखों से

एकाएक आंसू बहने लगे

वे नतमस्तक थे

मुझे प्यार करने का दंड मिल चूका था

मेरी व्यथा सुनकर पत्थरो में भी जान आ गयी थी


किशोर कुमार खोरेन्द्र


बुधवार, 21 अगस्त 2013

664-"मैं एक किताब हूँ "

"मैं एक किताब हूँ "
तुम्हारे और मेरे बीच 
शब्दों की ईटों से 
बना हुआ हैं एक पुल 
मैं एकांत में रहता हूँ 
जैसे जंगल में खिला होऊं एक फूल
तुम महानगर में रहती हो
सात समुन्दर दूर 




अपने मौन को
करता रहता हूँ अभिव्यक्त
मेरे मन के
कोरे कागज़ पर अनलिखे अक्षरों को
पढ़ लेती हैं तुम्हारी रूह
न तुम्हारा नाम जनता हूँ न पता न रूप
तुम कौन हो मुझे नहीं मालूम
मुझे लगता हैं मानों मैं एक किताब हूँ
तुम्हारी अनदेखी तस्वीर
जिसका
बन गयी हो 
पृष्ठ  आमुख

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 19 अगस्त 2013

663-"मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला "

"मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला "


मेरे पांव जमीं पर टिकते नहीं हैं 
तुम्हारी याद हैं सावन का झूला 
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


मेरी कविताओं को पढ़कर 

तुम्हारे दवारा
मेरी प्रशंसा के पुल बांधना
और मेरा मन ही मन फूला नहीं समाना
जिसकी प्रेरणा से मैं सृजन कर पाया हूँ
वह तुम ही हो
और नहीं हैं कोई दूजा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


तुम हो मेरे रहनुमा
तुम्हारे स्नेह की उँगलियों ने
जबसे मुझे हैं छुवा
बहारों सा लगता हैं
हर मौसम मुझे खुशनुमा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


मैं रेत कणों की तरह
अक्षर अक्षर था बिखरा हुआ
तुमने मांगी थी मेरे लिए दुआ
तभी तो मैं ढाई आखर से बने
एक शब्द की तरह हूँ जुड़ा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


अब नहीं हूँ मैं तनहा
न यह जग लगता हैं मुझे सूना
मेरे ख्यालों के उपवन में
तुम मिल ही जाती हो
जब भी मैंने तुम्हे ढूढा
तुमसे मिलकर मेरे ख़्वाब हुए सारे पूरे
मैं नहीं रहा अब अधूरा
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


तुम्हारा प्यार मेरी साँसों में हैं घुला
मेरे ह्रदय में बसी तुम्हारी सुन्दर छवि की
मैं रोज करता हूँ
काव्य -सुमनों से पूजा
मानो संग हो वो खुदा
मेरे पांव जमीं पर टिकते नहीं हैं
तुम्हारी याद हैं सावन का झूला
मैं कुछ भी तो नहीं हूँ भूला 


किशोर कुमार खोरेन्द्र 

{रहनुमा =पथ प्रदर्शक ,रहबर 
खुशनुमा=मनोरम }

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

662-"अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब "

"अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब "

पीले पुष्पों की हुई है बरसात 
घना हैं कोहरे का बाहुपाश 
दूबों के सर के 
ओस कण बने हैं ताज 
ओझल हुए से लग रहे हैं
वृक्षों के उलझे हुए शाख

खेतों के जल के दर्पण में
धीरे धीरे परछाईयाँ
ले रही हैं आकार
धरती पर जैसे उतर
आया हो सिंदूरी आकाश
सोच रही हैं वसुंधरा
कोई तो होगा
दिवस अवसान तक अब साथ

बिखरी हैं पीत वर्णीय धराशायी पंखुरियाँ
मानों हो वे रंगोली के कतार
काले मेघों के जमघट को कर पार
बड़ी कठिनाई से
पहुँच पाया हैं
भोर का यह धुन्धला प्रकाश

शुरू हो गया हैं कलरव
रंभाने लगी हैं गाय
गगन की दिशाए हैं अनजान
उड़ कर जाने लगे हैं नभ में
फिर भी
बगुलें अपने पंख पसार

एकाएक बरस पड़ी हैं सावन की बौछार
प्रचंड वेग से बहने लगी हैं
नदियाँ की उल्लसित धार
तार पर बैठी नन्ही चिड़ियाँ
विचार मग्न हैं
कहाँ से लाऊंगी आज
बच्चों के लिए आहार 



भींगे भींगे से इस मौसम में
मुझसे मेरा मन कहता हैं
न किया करो मित्र
इस जीवन में
किसी उत्तर की तलाश
ये दुनियाँ हैं एक
अनुत्तरित सवाल

प्रकृति का यह
अनुपम सौन्दर्य हैं नायाब
तटस्थ हो कर
इसे करना हैं बस आत्मसात

किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

661-"मेरी कोरी कल्पना"

"मेरी कोरी कल्पना" 

तुम्हारे खूबसूरत व्यैक्तित्व का 
मैं हूँ दीवाना 
तुम शमा हो मैं हूँ परवाना 


कभी छत पर आने के लिए 
कपड़ों को सुखाने का करती हो तुम बहाना 
कभी चोरी से नज़रें मिलाकर  चल देती हो 
तब अच्छा लगता तुम्हारा शरमाना 

मेरे किसी ख़त का 
तुमने जवाब नहीं दिया हैं मौन रहकर सीखा  हैं 
तुम्हारे लबों ने बस मुस्कुराना 

बस दूर से देखता रहा हूँ तुम्हे 
मेरे सपनों में ,मेरे ख्यालों में भी 
तुमने छोड़ दिया हैं आना 

यह मेरा एक तरफा प्रेम हैं 
बदले में मेरी  नहीं हैं कोई कामना 
मुझे लगता हैं 
कभी तुम हकीकत हो 
कभी हो  मेरी कोरी कल्पना 
तनहा ही रह जाउंगा आजीवन 
असंभव हैं तुम्हे पाना 

तुम्हारे खूबसूरत व्यैक्तित्व का 
मैं हूँ दीवाना 
तुम शमा हो मैं हूँ परवाना 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

660-"शब्दों का एक घोंसला "




"शब्दों का एक घोंसला "

ह्रदय के प्यार के सागर की 
आखरी सतह से 
सुनहरे अक्षरों के तिनकों को 


चुनकर मैंने बनाया हैं 
शब्दों का एक घोंसला
तुम्हारी कविता यदि रहने यहाँ
आ जाए तो बड़ जाएगा
मेरे काव्य का भी हौसला

कोमल छंदों के नर्म तकिये हैं
और प्रेम पर लिखे
नज्मों का हैं यहाँ पर बिछौना
तुम्हारे और मेरे
समवेत मधुर गीतों से
गूंज उठेगा
मौन के अन्तरिक्ष का कोना कोना

यहाँ पर न मन हैं न रूप
केवल मेरी आत्मा हैं
और हैं सिर्फ तुम्हारी रूह

कल्पनाओं की शाख पर
मैं और तुम करेंगें बसेरा
क्षितिज लेकर आया हैं
हमारे लिए मनोरम नूतन सबेरा

मिलन की आश में विरह की न रह पायेगी अब दूरी
मेरे काव्य के नजदीक रहकर
तुम्हारी कविता भी हो जायेगी पूरी


ह्रदय के प्यार के सागर की
आखरी सतह से
सुनहरे अक्षरों के तिनकों को
चुनकर मैंने बनाया हैं
शब्दों का एक घोंसला
तुम्हारी कविता यदि रहने यहाँ
आ जाए तो बड़ जाएगा
मेरे काव्य का भी हौसला

किशोर कुमार खोरेन्द्र

बुधवार, 14 अगस्त 2013

659-"मैंने कर लिया हैं तुम्हे ह्रदयंगम "

"मैंने कर लिया हैं तुम्हे ह्रदयंगम "


तुम हो मेरे हमदम 
यदि तुम प्यार का सागर हो 
तो मैं हूँ प्रेम मे तुम्हारे 
उन्मत एक उदगम 
तुम हो मेरे हमदम
तुम्हारे नाम को ,रूप को
रेखांकित कर चुका है
मेरा स्मृति पटल
मेरे मन में तुम्हारी याद
कभी न होगी कम
मैंने कर लिया हैं तुम्हे ह्रदयंगम
तुम हो मेरे हमदम
तुमसे मिलन की आश में
विरह को जीता आया हूँ अब तलक
मैं कई कई जनम
तुम हो मेरे हमदम
मेरी रूह की प्यास जो बुझा दे
अमृत से बनी वही
एक बूंद हो तुम शबनम
तुम हो मेरे हमदम
किशोर कुमार खोरेन्द्र

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

658-असीम और अपरमीत"

असीम और अपरमीत"

जल कहता हैं

मुझे मत छूना

सिहर कर मैं जाउंगा हिल

परछाई कहती

मत करना मेरा स्पर्श

भावावेश में हो उत्तेजित

मैं जाउंगी मिट



लगता हैं मैं हूँ मानों -

मनुज ..एक सीप

जो अपने सीने में -

पंखुरियों के सदृश्य

ह्रदय की भावनाओं से निर्मित

कल्पनाओं के रंगीन मोती कों -छिपाए हुए

रह जाता हैं -आखिर तक गरीब

मेरी कल्पना तुम नहीं हो कमीज

की -

जिसे मैं उतार कर

खूंटी पर टांग कर -कर जाऊ विस्मृत

तुमने तो मेरे -तन ,मन ,और आत्मा तक कों

रंगीन चूनरी सा ओढ़ रखा हैं

हे मेरी कल्पनातीत

इसलिए चाहता हूँ मैं -

कभी तुम जाओ मुझे

इस स्वप्न रूपी जग में

साकार रूप में मिल

लेकिन तुम कहती हों -मुझसे ...

मैं आईने के भीतर हूँ समाहित

मुझे बिम्ब समझो या ...

प्रतिबिम्ब

मतलब एक ही हैं -

ध्यान -मग्न यदी ..विचारोगे

होकर तल्लीन

मेरी सुन्दरता हैं ...

अनुपम और रमणीक

जिस दर्पण से मैं होती हूँ -परावर्तीत

वह दर्पण भी हैं

असीम और अपरमीत

इसलिए हे कवि -

मैं कल्पना हूँ

चिर यौवना और शून्य में --कोहेरे सी विलीन

मैं स्वप्ना सी तुम्हें होते रहती हूँ

जागरण हो या नींद -

दोनों ही अवस्थाओं में आभासित

इसलिए मुझे चाहोगे

अपने बाहूपाश में यदि जकड़ना

तो

चूर चूर हो जायेंगा उसी क्षण

दर्पण का भी अस्तित्व

फिर कैसे छू पाओगे

कल्पना में ...सौन्दर्य के उतुंग शिखर कों

हे कवि .......!

सृजनशील

इसीलिए मैं तुम्हे लगती हूँ

कभी आकाश की तरह दूर

कभी धड़कते ह्रदय के समान अति समीप

किशोर कुमार खोरेन्द्र

सोमवार, 12 अगस्त 2013

657-"सपना"

"सपना" 



सपनों  मे मुझे बादल



घेरते हैं 

रेत ..मेरे पांवो मे धंस जाते हैं 

नदी ...मुझमे

डूबती चली जाती हैं  

रास्ते ..मुझ पर से चलने लगते हैं 

लेकीन मै चाहता हूँ 

हर रात

स्वप्न वही से आरम्भ हो

जहाँ  पर वह मुझे

पिछली रात छोड़ गया था

पर ऐसा होता नही कभी

हर बार मुझे रेल की तरह 

नए सुरंगों से होकर 

या 

कभी तुम्हें और मुझे

दो समानांतर  पटरियों सा -

गुजरना ही पड़ता है

वो बादल था या किसी का आँचल

वो नदी थी या किसी का प्यार

वो रेत थी या किसी की देह

इस दुनियाँ  की ही तरह

सपनो मे भी

सब कुछ अधूरा ही रह जाता ही

मेरे बहुत करीब आकर

पर्वत मुझे अकेला -

छोड़ जाता है

तुम्हें भी तुम्हारे सपने बुला लेते होंगे

मेरे सपनो मे तुम रहती हो 

पर मै तुम्हारे  सपनो मे हूँ  या नही ...

तुमसे कैसे पूंछू 

कितना अच्छा होता

हम सभी

स्वप्न मे भी मिलते

और

मेरा स्वप्न -

तुम्हारे स्वप्न से पूछता ...

क्या मै तुम्हारे स्वप्न में  हूँ 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

656-"हमारे चेहेरों की परछाईयाँ



"हमारे चेहेरों की परछाईयाँ


तुम्हारे चेहेरे का प्रतिबिम्ब
सपनों की नदी में बहते हुए  मेरे सपनों के तट तक पहुंचता हैं 



उस चेहेरे कों मैं अपनी हथेली में रख कर गौर से निहारता हूँ

बिंदियां में रंग सा खुद कों भरा पाता हूँ

सीप जैसे ...सुन्दर नयनों के भीतर स्वयं की तस्वीर कों जड़ा हुआ पाता हूँ

मुझे इतने समीप पाकर सपने में भी वह मुस्कुराने लगती हैं

और

उसके अधरों की दो पंखुरियां खिल जाती हैं

रेशम के धागों के सदृश्य उसके अलकों के महीन जाल में अपने ध्यान कों उलझा हुआ पाता हूँ

उस्के गालो का स्पर्श पाते ही मेरी उंगलियाँ फिसल सी जाती हैं

हम दोनों महसूस करते हैं

कि -

हमारे चेहेरों की परछाईयाँ इसी तरह रोज रात कों

एक दूसरे की हथेलियों पर सर रख कर सोती हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

655-"जबसे आया सावन "

"जबसे आया सावन "

अम्बर पर छाये काले बादल 
धरती का भींगा आँचल 
हरा भरा हुआ कानन 
जबसे आया सावन 
महानगर से लौट आया पूरा गाँव
करने सुमधूर लोक गीतों का गायन
जिन्होंने किया था
पिछले बरस पलायन
कतारों मे ऊगने लगी हैं नयी उम्मीदें
खेत हुए फिर मन भावन
मिलने आयेंगे साजन
यह सोचकर
सरक रहा खुद ब खुद दामन
जिसे जानते नहीं ,पहचानते नहीं
धुंधली सी वह सूरत
याद आने लगी हैं अचानक
नयन बन गए मदभरे सागर
पीकर मदहोश हो गया सा
लगता हैं सारा आलम
महुआ के घने वृक्ष तले
ठहरी सी लगती हैं सहमी सहमी सी
नीरवता की नज़ाकत
मानों सीख रही हो
मन ही मन प्रेम का उच्चारण
मेरी पीठ पर लिख दो
कहता हैं कोरा काग़ज
एक सरस प्रेम गीत अकारण
अम्बर पर छाये काले बादल
धरती का भींगा आँचल
हरा भरा हुआ कानन
जबसे आया सावन

किशोर कुमार खोरेन्द्र


रविवार, 11 अगस्त 2013

654"तुम मुझे चाहती हो"

"तुम मुझे  चाहती हो"

एक नदी
की
कल्पना मे -
सिक्को की जगह - छोर में
जीने लायक यादगार पलो को
बाँध कर रखे -मेरे रुमाल को
तुमने -थामा नही
पानी मे बह जाने दिया
एक पहाड़ के स्वप्न में
चोटी पर पहुँच  चूका था मैं
वापस लौटने के लिए
एक पगडण्डी  को मेरे साथ
आने  से तुमने मना  कर दिया
एक जंगल के चिंतन मे
तुमने मुझे
पेडो की छाँह   से वंचित रखा
सपनो मे भी
कल्पनाओं  में  भी
मनन में भी
तुम कभी -नदी को प्यार की
छीटों  की तरह -मुझ पर उड़ेलती  रही
मै तुमसे दूर न चला जाऊं
इसलिए -पहाडो को भी
मेरी  राह मे -
रोडे  की तरह अटकाती रही
जंगल के गहरे मौन से
कभी -कभी मुझे डराती रही
सताते उसी को है
जिससे प्यार अधिक होता है
तो मै जान लूँ  की
तुम मुझे  चाहती हो
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

653-"दिवस हो जाता हैं और उज्जवल"

"दिवस हो जाता हैं और उज्जवल" 

खुलती हैं जब 
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक 
रात सुबह मे जाती हैं बदल 
चिड़ियों की चहक 
सुनायी देती हैं दूर तलक 
खिल आते हैं सरोवर मे कमल 
क्षितिज की सीमा को 
लांघ आती हैं सुनहरी किरणे दमक 
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक
लेती हो जब तुम अंगडाई
नदियों की लहरे जाती हैं मचल
खेतों मे लहलहाने लगती हैं
ऊगी हुई नयी फसल
प्यासी जड़ों को सींचने के लिए
खुद ब खुद दौड़ पड़ती हैं धारायें
करती हुई कलकल
पत्तों की नोक पर अटकी हुई सावन की
अंतिम बूंद जाती हैं टपक
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक

निहारती हो जब
अपना खूबसूरत चेहरा सुकोमल
झरने लगता हैं पीपल
किनारों पर उछलकर
तुम्हारे सौन्दर्य को निहारने के लिए
मौजें करने लगती हैं पहल
छिड़कती हो जब
अपने महरुख पर जल शीतल
गीली धूप की बूंदों से
भींग जाता हैं हरा भरा जंगल
खिड़की से झांकती हैं
बाहर जब तुम्हारी नज़र
मोंगरे की फूलों की तरह तब
दिवस हो जाता हैं और उज्जवल
घुमड़ आये काले बादलों को हटाकर
तुम्हे देखने लगता हैं
एकटक.... फ़लक
खुलती हैं जब
तुम्हारी नींद से बोझिल हुई पलक

किशोर कुमार खोरेन्द्र



सोमवार, 5 अगस्त 2013

652-"मेरी चेतना की शमा"

"मेरी चेतना की शमा"

अब न मेरा नाम हैं न मेरा पता 
मैं हो गया हूँ लापता 

अज़ल से हूँ मैं एक रवाँ 
खुद को खोज रहा हूँ
न मेरा कोई शहर हैं न कदा

भीतर उजाला हैं
बाहर हैं अन्धेरा घना

हर तरफ खामोशी हैं
शज़र के सायों से भी
कुछ कहना यहाँ हैं मना

दुःख की अनेक कहानियों सी हैं जिंदगी
करुणा से मेरा ह्रदय हैं भरा

मेरी पूरी कोशिश रहती हैं
कोई यह न जान पाए की -
मैं कितना सहमा सा हूँ
और कितना डरा

एक दिन -
मेरा मन धुँवा बनकर उड़ जाएगा
मेरी देह हो जायेगी फ़ना

पर इसी तरह
प्रज्वलित रहेगी मेरी चेतना की शमा
जब तक घूमती रहेगी यह धरा

किशोर कुमार खोरेन्द्र


651-'चन्दन सी तुम्हारी महक"

'चन्दन सी तुम्हारी महक" 

कभी दर्पण में ,कभी जल में 
तुम्हारी छवि उभर आई 
तुम हो सिर्फ एक परछाई 
मन के कोरे कागज़ पर 
तुम्हारी तस्वीर मैंने बनायी
तुम हो सिर्फ परछाई
बिना अक्षरों के तुम्हे पढ़ लेता हूँ
बिना स्वरों के तुम्हे सुन लेता हूँ
ख़ामोशी की ऐसी हो तुम शहनाई
तुम अज्ञात हो, तुम अद्रश्य हो
फिर भी
तुम्हारे होने के अहसास के मीठे जल से
लबालब भरी होती हैं
किसी झील सी मेरी सूनी तन्हाई
तुम हो सिर्फ परछाई
हालाँ की तुम हो केवल कल्पना
इस दुनियाँ रूपी सपने मे
तुम्हारी याद के संग
लगे अच्छा मुझे भटकना
जीवन की राह की कोई मंजिल हैं या नहीं
मालूम नहीं
लेकिन चन्दन सी तुम्हारी महक
सांसों मे हैं मेरे भरआई
तुम हो सिर्फ एक परछाई
किशोर कुमार खोरेन्द्र



शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

650-"तुम हो मेरा जमीर "

"तुम हो मेरा जमीर "

हालांकि तुम अक्षरों से ,शब्दों से 
परे हो 
फिर भी मेरे मन के पन्नों में अंकित 
खामोशी का अंजुम हो तुम अमिट 
तुम हो मेरा जमीर 
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर 
तुम ही हो मेरी मंजिल 
तुम्हारे बिना 
मैं हूँ केवल आवारा सा एक तरीक
जहां जहां
तुम्हारे अनुपम हुश्न की सुहावनी धूप हैं
वहां वहां…
परछाईयों सा होता हूँ
मैं तुम्हारे संग शरीक
तुम्हारी बोलती सी निगाहों मे
हैं ऐसी कशिश
की हो गया हूँ मैं तुम्हारा मुरीद
तुम्हारी नर्म उड़ती हुई जुल्फें
तबस्सुम बिखेरते हुए तुम्हारे लब
मुझसे कह रहे हैं मानो
लहरों की तरह जबरदस्ती
आ जाओ हमारे करीब
नहीं हैं कोई बंदिश
पर मेरे मन मे हैं
कशमकश अजीब
बेपनाह मोहब्बत यदि तुम मुझसे करती हो
तो मेरे ह्रदय में भी है
तुम्हारे खातिर प्रेम असीम
मेरे ख़्वाबों की तरह
तुम्हारे ख़्वाब भी
क्या होते हैं उतने ही हसीन
मेरे ख्यालों के आकाश मे
तुम्हारे अनकहे मूक शब्दों के अनंत तारे
जगमगाते हैं
इसलिए मैं हूँ खुशनसीब
तुम्हारा सौन्दर्य हैं फरीद
निहार कर उसे
मैं रह गया हूँ इस जहां में चकित
खुदबखुद हो जाती हैं
कविताएं सृजित
नहीं हैं ये तस्नीफ़
यदि तुम हमीदा हो
तो मैं हूँ हमीद
पर तुम्हारे और मेरे बीच
अपारदर्शी कोहरे की दीवार की तरह
उठी हुई है
हमारी अपनी अपनी तहजीब
तुम हो मेरा जमीर
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर
मै हूँ तुम्हारे बिना सिर्फ एक शरीर
किशोर कुमार खोरेन्द्र

{१-जमीर =आत्मा ,मन २-तरीक =रास्ता ,३-मुरीद =अनुयायी ,४-तबस्सुम =मुस्कराहट ,५-फरीद =अनुपम ,६-तस्नीफ़ =बनायी हुई कविता ,७-तहजीब =सु संस्कार ,८-हमीदा =साध्वी ,९-हमीद =सदाचारी १०-अंजुम =नज्म का बहुवचन }