शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

648-"क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं "

"क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं "
जबसे तुम मुझे छोड़ कर गयी हो 
विरह के एक गीत को 
मैंने आजीवन गाया हैं 
सब छाया हैं सब माया हैं 
तुम्हारी रूह की परछाई से मेरी रूह की परछाई का 
मिलन हुआ था कभी
आत्मा अमर हैं मरती तो सिर्फ काया हैं
सब छाया हैं सब माया हैं
इस दुनिया को त्यागकर जो चला गया
वह कब लौट कर आया हैं
सब छाया हैं सब माया हैं
मेरे मन मे क्यों तुम्हारी छवि हैं
मेरे ह्रदय में क्यों तुम्हारा प्यार बस गया हैं
तुमने मुझे जो गीत सुनाया था
उसे मेरे ओंठों ने आज फिर गुनगुनाया हैं
क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

इमरान अंसारी ने कहा…

अक्सर यही होता है भ्रम बना रहता है कि सब माया है परन्तु उससे मोह नहीं छूटता ..सुन्दर कविता।

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

imran ansaari ji sach kahaa aapne ...shukriya